वफ़ा Poetry (page 13)

बस एक बूँद थी औराक़-ए-जाँ में फैल गई

सिद्दीक़ मुजीबी

हर चंद कि प्यारा था मैं सूरज की नज़र का

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

ग़ाज़ा तो तिरा उतर गया था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

दिल की बस्ती पे किसी दर्द का साया भी नहीं

सिद्दीक़ शाहिद

मसअले का हल न निकला देर तक

श्याम सुन्दर नंदा नूर

रुका तो राज़ खुला कब से अपने घर में था

शुजाअत अली राही

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

जिस को जाना था कल तक ख़ुदा की तरह

शोला हस्पानवी

बे-नश्शा बहक रहा हूँ कब से

शोहरत बुख़ारी

अपनों से मुरव्वत का तक़ाज़ा नहीं करते

शोहरत बुख़ारी

तुझे दिल में बसाएँगे तिरे ही ख़्वाब देखेंगे

शमशाद शाद

हाए क्या हाल कर लिया दिल का

शमशाद शाद

दिल पर सितम हज़ार करे बेवफ़ा के लब

शमशाद शाद

मुझ को कहाँ ये होश तिरी जल्वा-गाह में

शिव दयाल सहाब

जिस तरफ़ हाल-ए-जुनूँ में तेरे दीवाने गए

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

ग़ैर से किया गिला करे कोई

शिफ़ा कजगावन्वी

न है उस को मुझ से ग़फ़लत न वो ज़िम्मेदार कम है

शिफ़ा कजगावन्वी

उलमा-ए-ज़िंदानी

शिबली नोमानी

मुस्लिम-लीग

शिबली नोमानी

ज़िंदगी नाम है जिस चीज़ का क्या होती है

शेर सिंह नाज़ देहलवी

पहुँचा है आज क़ैस का याँ सिलसिला मुझे

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

सितम को हम करम समझे जफ़ा को हम वफ़ा समझे

ज़ौक़

दुकान-ए-हुस्न में मिलती नहीं मता-ए-वफ़ा

ज़ौक़

इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है

ज़ौक़

चश्म-ए-क़ातिल हमें क्यूँकर न भला याद रहे

ज़ौक़

बुतो ये शीशा-ए-दिल तोड़ दो ख़ुदा के लिए

शैख़ अली बख़्श बीमार

इस क़दर ख़ुद पे हम जफ़ा न करें

शहज़ाद रज़ा लम्स

गह हम से ख़फ़ा वो हैं गहे उन से ख़फ़ा हम

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

बे-नंग-ओ-नाम

शाज़ तमकनत

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