वफ़ा Poetry (page 73)

ज़र्फ़ है किस में कि वो सारा जहाँ ले कर चले

आज़िम कोहली

जो होगा सब ठीक ही होगा होने दो जो होना है

आज़िम कोहली

इक इश्क़ है कि जिस की गली जा रहा हूँ मैं

आज़िम कोहली

उल्फ़तों का ख़ुदा नहीं हूँ मैं

अातिश इंदौरी

काश मैं तुझ सा बेवफ़ा होता

अातिश इंदौरी

उमीद उन से वफ़ा की तो ख़ैर क्या कीजे

अातिश बहावलपुरी

गिला मुझ से था या मेरी वफ़ा से

अातिश बहावलपुरी

सितम को उन का करम कहें हम जफ़ा को मेहर-ओ-वफ़ा कहें हम

अातिश बहावलपुरी

ख़मोश बैठे हो क्यूँ साज़-ए-बे-सदा की तरह

अातिश बहावलपुरी

रहज़नों के हाथ सारा इंतिज़ाम आया तो क्या

आतिफ़ वहीद 'यासिर'

रहज़नों के हाथ सारा इंतिज़ाम आया तो क्या

आतिफ़ वहीद 'यासिर'

इंतिहा होने से पहले सोच ले

अस्नाथ कंवल

इश्क़ पाबंद-ए-वफ़ा है न कि पाबंद-ए-रुसूम

आसी उल्दनी

दी गई तरतीब-ए-बज़्म-ए-कुन-फ़काँ मेरे लिए

आसी रामनगरी

तबीअत की मुश्किल-पसंदी तो देखो

आसी ग़ाज़ीपुरी

तिरे कूचे का रहनुमा चाहता हूँ

आसी ग़ाज़ीपुरी

बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता

आशुफ़्ता चंगेज़ी

घरौंदे ख़्वाबों के सूरज के साथ रख लेते

आशुफ़्ता चंगेज़ी

बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता

आशुफ़्ता चंगेज़ी

तू वफ़ा कर के भूल जा मुझ को

आलोक श्रीवास्तव

उस बेवफ़ा से कर के वफ़ा मर-मिटा 'रज़ा'

आले रज़ा रज़ा

हम ने बे-इंतिहा वफ़ा कर के

आले रज़ा रज़ा

मायूस ख़ुद-ब-ख़ुद दिल-ए-उम्मीद-वार है

आले रज़ा रज़ा

ज़ंजीर से जुनूँ की ख़लिश कम न हो सकी

आल-ए-अहमद सूरूर

सियाह रात की सब आज़माइशें मंज़ूर

आल-ए-अहमद सूरूर

नवा-ए-शौक़ में शोरिश भी है क़रार भी है

आल-ए-अहमद सूरूर

ख़याल जिन का हमें रोज़-ओ-शब सताता है

आल-ए-अहमद सूरूर

आज से पहले तिरे मस्तों की ये ख़्वारी न थी

आल-ए-अहमद सूरूर

चाहत ग़म्ज़े जता रही है

आग़ा अकबराबादी

बुत-ए-ग़ुंचा-दहन पे निसार हूँ मैं नहीं झूट कुछ इस में ख़ुदा की क़सम

आग़ा अकबराबादी

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