वफ़ा Poetry (page 12)

आज भी हाथ पे है तेरे पसीने की तरी

सुलैमान अरीब

ख़ैर उस से न सही ख़ुद से वफ़ा कर डालो

सुहैल अहमद ज़ैदी

जाँ तन का साथ दे न तो दिल ही वफ़ा करे

सुहैल अहमद ज़ैदी

ख़राब-ए-दीद को यूँ ही ख़राब रहने दे

सुहा मुजद्ददी

ज़ब्त की क़ैद-ए-सख़्त ने हम को रिहा नहीं किया

सूफ़िया अनजुम ताज

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

रस्म-ए-मेहर-ओ-वफ़ा की बात करें

सूफ़ी तबस्सुम

किसी में ताब-ए-अलम नहीं है किसी में सोज़-ए-वफ़ा नहीं है

सूफ़ी तबस्सुम

ख़ामोशी कलाम हो गई है

सूफ़ी तबस्सुम

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं

सूफ़ी तबस्सुम

जान दे कर वफ़ा में नाम किया

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न मजबूर-ए-जफ़ा है शायद

सूफ़ी तबस्सुम

हर ज़र्रा उभर के कह रहा है

सूफ़ी तबस्सुम

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

सूफ़ी तबस्सुम

आँखें खुली थीं सब की कोई देखता न था

सूफ़ी तबस्सुम

ये सिखाया है दोस्ती ने हमें

सुदर्शन फ़ाकिर

उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े

सुदर्शन फ़ाकिर

तुम न घबराओ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देख कर

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरे दुख की कोई दवा न करो

सुदर्शन फ़ाकिर

दुनिया से वफ़ा कर के सिला ढूँढ रहे हैं

सुदर्शन फ़ाकिर

अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे हँसी आती है

सुदर्शन फ़ाकिर

अब कोई सिलसिला नहीं बाक़ी

सिया सचदेव

तुझे पा के तुझ से जुदा हो गए हम

सिराज लखनवी

क़दम तो रख मंज़िल-ए-वफ़ा में बिसात खोई हुई मिलेगी

सिराज लखनवी

सनम हज़ार हुआ तो वही सनम का सनम

सिराज औरंगाबादी

मैं न जाना था कि तू यूँ बे-वफ़ा हो जाएगा

सिराज औरंगाबादी

कौन कहता है जफ़ा करते हो तुम

सिराज औरंगाबादी

दिल मिरा साग़र-ए-शिकायत है

सिराज औरंगाबादी

भरा कमाल-ए-वफ़ा सें ख़याल का शीशा

सिराज औरंगाबादी

रहबर मिला न हम को कोई रहनुमा मिला

सिद्दीक़ उमर

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