वफ़ा Poetry (page 68)

किसी बेवफ़ा की ख़ातिर ये जुनूँ 'फ़राज़' कब तक

अहमद फ़राज़

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

अहमद फ़राज़

ढूँड उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

अहमद फ़राज़

ज़ेर-ए-लब

अहमद फ़राज़

तो बेहतर है यही

अहमद फ़राज़

मुझ से पहले

अहमद फ़राज़

मुहासरा

अहमद फ़राज़

ख़्वाबों के ब्योपारी

अहमद फ़राज़

भली सी एक शक्ल थी

अहमद फ़राज़

ऐ मेरे सारे लोगो

अहमद फ़राज़

ये तबीअत है तो ख़ुद आज़ार बन जाएँगे हम

अहमद फ़राज़

ये आलम शौक़ का देखा न जाए

अहमद फ़राज़

उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया

अहमद फ़राज़

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ

अहमद फ़राज़

उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है

अहमद फ़राज़

तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ

अहमद फ़राज़

तिरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जल्वागरी रही

अहमद फ़राज़

तरस रहा हूँ मगर तू नज़र न आ मुझ को

अहमद फ़राज़

सुकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ

अहमद फ़राज़

सू-ए-फ़लक न जानिब-ए-महताब देखना

अहमद फ़राज़

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते

अहमद फ़राज़

साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले

अहमद फ़राज़

पयाम आए हैं उस यार-ए-बेवफ़ा के मुझे

अहमद फ़राज़

न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो

अहमद फ़राज़

न दिल से आह न लब से सदा निकलती है

अहमद फ़राज़

कहा था किस ने कि अहद-ए-वफ़ा करो उस से

अहमद फ़राज़

जुज़ तिरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे

अहमद फ़राज़

जिस्म शो'ला है जभी जामा-ए-सादा पहना

अहमद फ़राज़

जब तिरी याद के जुगनू चमके

अहमद फ़राज़

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

अहमद फ़राज़

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