वफ़ा Poetry (page 66)

बर्क़-ए-कलीसा

अकबर इलाहाबादी

वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे

अकबर इलाहाबादी

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है

अकबर इलाहाबादी

फिर गई आप की दो दिन में तबीअ'त कैसी

अकबर इलाहाबादी

कहाँ वो अब लुत्फ़-ए-बाहमी है मोहब्बतों में बहुत कमी है

अकबर इलाहाबादी

सन्नाटा तूफ़ाँ से सिवा हो ये भी तो हो सकता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

आज यूँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे

अकबर अली खान अर्शी जादह

इतना करम इतनी अता फिर हो न हो

अजमल सिद्दीक़ी

हर घड़ी रहता है अब ख़दशा मुझे

अजमल अजमली

ऐ हुस्न जब से राज़ तिरा पा गए हैं हम

अजमल अजमली

बिखरा हूँ जब मैं ख़ुद यहाँ कोई मुझे गिराए क्यूँ

अजय सहाब

तर्क-ए-तअल्लुक़ कर तो चुके हैं इक इम्कान अभी बाक़ी है

ऐतबार साजिद

बंद दरीचे सूनी गलियाँ अन-देखे अनजाने लोग

ऐतबार साजिद

मैं अपना कार-ए-वफ़ा आज़माऊँगा फिर भी

ऐन ताबिश

गुज़रते वक़्त को बुनियाद करने वाला हूँ

ऐन ताबिश

नाकाम हैं असर से दुआएँ दुआ से हम

अहसन मारहरवी

चाहिए इश्क़ में इस तरह फ़ना हो जाना

अहसन मारहरवी

रिश्ता-ए-दिल उसी से मिलता है

अहमद निसार

प्यार किया था तुम से मैं ने अब एहसान जताना क्या

अहमद ज़िया

मिला जो धूप का सहरा बदन शजर न बना

अहमद ज़िया

वो फूल जो मुस्कुरा रहा है

अहमद ज़फ़र

सियाह रात की हर दिलकशी को भूल गए

अहमद ज़फ़र

जंगल का सन्नाटा मेरा दुश्मन है

अहमद ज़फ़र

जुनूँ की रस्म ज़माने में आम हो न सकी

अहमद शाहिद ख़ाँ

दुनिया सभी बातिल की तलबगार लगे है

अहमद शाहिद ख़ाँ

कुछ इस तरह से लुटी है मता-ए-दीदा-ओ-दिल

अहमद रियाज़

ब-वस्फ़-ए-शौक़ भी दिल का कहा नहीं करते

अहमद रियाज़

ब वस्फ़-ए-शौक़ भी दिल का कहा नहीं करते

अहमद रियाज़

सरगोशी

अहमद राही

तवील रातों की ख़ामुशी में मिरी फ़ुग़ाँ थक के सो गई है

अहमद राही

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