वसल Poetry (page 7)

हाथों को उठा जान से आख़िर को रहूँगा

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ

शाह नसीर

हम ख़राबे में बसर कर गए ख़ामोशी से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हमारे पास था जो कुछ लुटा के बैठ रहे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

बरसी हैं वो आँखें कि न बादल कभी बरसे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

क़यामत से नहीं कम इंतिज़ार-ए-वस्ल की लज़्ज़त

शफ़क़ इमादपुरी

फिर उसी बुत से मोहब्बत चुप रहो

शादाब उल्फ़त

सोहबत-ए-वस्ल है मसदूद हैं दर हाए हिजाब

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

गले लिपटे हैं वो बिजली के डर से

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

हर आन एक नया इम्तिहान सर पर है

शबनम रूमानी

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

शबनम रूमानी

लज़्ज़त-ए-वस्ल से भी बढ़ के मज़ा आएगा

शाद अमृतसरी

जो भी तख़्त पे आ कर बैठा उस को यज़्दाँ मान लिया

सय्यद नसीर शाह

बूँद अश्कों से अगर लुत्फ़-ए-रवानी माँगे

सययद मोहम्म्द अब्दुल ग़फ़ूर शहबाज़

परेशाँ था मगर ऐसा नहीं था

सावन शुक्ला

ख़ून की ख़ुश्बू

सत्यपाल आनंद

हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँ

सरवत ज़ेहरा

उसी का जल्वा-ए-ज़ेबा है चाँदनी क्या है

सरीर काबिरी

तुम्हें शब-ए-व'अदा दर्द-ए-सर था ये सब हैं बे-ए'तिबार बातें

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ग़श भी आया मिरी पुर्सिश को क़ज़ा भी आई

साक़िब लखनवी

वो सख़ी है तो किसी रोज़ बुला कर ले जाए

साक़ी फ़ारुक़ी

बाहर के असरार लहू के अंदर खुलते हैं

साक़ी फ़ारुक़ी

दिल को उजड़े हुए बीते हैं ज़माने कितने

सलमान अंसारी

साल की आख़िरी शब

सलीम कौसर

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