याद Poetry (page 33)

कोई सच्चे ख़्वाब दिखाता है पर जाने कौन दिखाता है

सलीम कौसर

कभी मौसम साथ नहीं देते कभी बेल मुंडेर नहीं चढ़ती

सलीम कौसर

इस आलम-ए-हैरत-ओ-इबरत में कुछ भी तो सराब नहीं होता

सलीम कौसर

चराग़-ए-याद की लौ हम-सफ़र कहाँ तक है

सलीम कौसर

बस इक रस्ता है इक आवाज़ और एक साया है

सलीम कौसर

शाख़-दर-शाख़ तिरी याद की हरियाली है

सलीम फ़िगार

आख़िरी पड़ाव

सलीम फ़िगार

कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए

सलीम फ़िगार

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

सलीम फ़िगार

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

सलीम फ़िगार

चमकती ओस की सूरत गुलों की आरज़ू होना

सलीम फ़िगार

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

कम रंज मौसम-ए-गुल-ए-तर ने नहीं दिया

सलीम फ़राज़

हर-चंद मिरा शौक़-ए-सफ़र यूँ न रहेगा

सलीम फ़राज़

अभी मौजूद थी लेकिन अभी गुम हो गई है

सलीम फ़राज़

नींद से पहले

सलीम अहमद

'सलीम' दश्त-ए-तमन्ना में कौन है किस का

सलीम अहमद

मैं उस को भूल गया था वो याद सा आया

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

बजा ये रौनक़-ए-महफ़िल मगर कहाँ हैं वो लोग

सलीम अहमद

तरब-आफ़रीं है कितना सर-ए-शाम ये नज़ारा

सलाम संदेलवी

तसलसुल

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

बहुत दिनों की बात है....

सलाम मछली शहरी

वो आशिक़ हैं कि मरने पर हमारे

सख़ी लख़नवी

नज़'अ के दम भी उन्हें हिचकी न आएगी कभी

सख़ी लख़नवी

हिचकियाँ आती हैं पर लेते नहीं वो मेरा नाम

सख़ी लख़नवी

'सख़ी' से छूट कर जाएँगे घर आप

सख़ी लख़नवी

रुख़ पर है मलाल आज कैसा

सख़ी लख़नवी

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