दर्पण Poetry (page 22)

मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ

ज़फ़र

ख़्वाह कर इंसाफ़ ज़ालिम ख़्वाह कर बेदाद तू

ज़फ़र

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ज़फ़र

हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए

ज़फ़र

ज़रूरतों की हमाहमी में जो राह चलते भी टोकती है वो शाइ'री है

बद्र-ए-आलम ख़लिश

तुम्हारे दिल में जो ग़म बसा है तो मैं कहाँ हूँ

बद्र वास्ती

चार सम्तें आईना सी हर तरफ़

अज़रा परवीन

आसमाँ साहिल समुंदर और मैं

अज़रा परवीन

खुलता नहीं कि हम में ख़िज़ाँ-दीदा कौन है

अज़्म बहज़ाद

कमाल ये है कि दुनिया को कुछ पता न लगे

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

हर आईना इक अक्स-ए-नौ ढूँडता है

अज़ीज़ तमन्नाई

मैं!

अज़ीज़ क़ैसी

जब से ज़ुल्फ़ों का पड़ा है इस में अक्स

अज़ीज़ लखनवी

'मीर'

अज़ीज़ लखनवी

क्यूँ न हो शौक़ तिरे दर पे जबीं-साई का

अज़ीज़ लखनवी

इश्क़ जो मेराज का इक ज़ीना है

अज़ीज़ लखनवी

हुस्न-ए-आलम-सोज़ ना-महदूद होना चाहिए

अज़ीज़ लखनवी

जफ़ा देखनी थी सितम देखना था

अज़ीज़ हैदराबादी

हरम का आईना बरसों से धुँदला भी है हैराँ भी

अज़ीज़ हामिद मदनी

आतिश-ए-मीना नज़र आई हरीफ़ाना मुझे

अज़ीज़ हामिद मदनी

वो इक नज़र से मुझे बे-असास कर देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

पड़ा है ज़िंदगी के इस सफ़र से साबिक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

न जाने कब से बराबर मिरी तलाश में है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मुझे कहाँ मिरे अंदर से वो निकालेगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ख़ुद में उतरूँगी तो मैं भी लापता हो जाऊँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हटा के मेज़ से इक रोज़ आईना मैं ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अलावा इक चुभन के क्या है ख़ुद से राब्ता मेरा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

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