आंखें Poetry (page 12)

नज़र समेटें बटोर कर इंतिज़ार रख दें

शमीम अब्बास

इक्का दुक्का शाज़-ओ-नादिर बाक़ी हैं

शमीम अब्बास

अहम आँखें हैं या मंज़र खुले तो

शमीम अब्बास

रोज़ शाम होती है रोज़ हम सँवरते हैं

शकीला बानो

याद तुम आए तो फिर बन गईं बादल आँखें

शकील शम्सी

ज़िंदगी और मौत का यूँ राब्ता रह जाएगा

शकील सरोश

चाहत की लौ को मद्धम कर देता है

शकील जमाली

बुज़-दिली होगी चराग़ों को दिखाना आँखें

शकील बदायुनी

सरगुज़िश्त-ए-दिल को रूदाद-ए-जहाँ समझा था मैं

शकील बदायुनी

रह वफ़ा में कोई साहिब-ए-जुनूँ न मिला

शकील बदायुनी

लतीफ़ पर्दों से थे नुमायाँ मकीं के जल्वे मकाँ से पहले

शकील बदायुनी

तुझ को सोचों तो तिरे जिस्म की ख़ुशबू आए

शकील आज़मी

साथी

शकेब जलाली

लरज़ता दीप

शकेब जलाली

इस ख़ाक-दाँ में अब तक बाक़ी हैं कुछ शरर से

शकेब जलाली

मैं रिवायत हूँ एक भूली हुई

शाइस्ता यूसुफ़

तुम आओगे

शाइस्ता हबीब

निगाहें जोड़ और आँखें चुरा टुक चल के फिर देखा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तुर्फ़ा माजून है हमारा यार

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सच अगर पूछो तो ना-पैदा है यक-रू आश्ना

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जब से तुम्हारी आँखें आलम को भाइयाँ हैं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

गुल की और बुलबुल की सोहबत को चमन का शाना है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखने से तिरे जी पाता हूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ख़्वाह महसूर ही कर दें दर-ओ-दीवार मुझे

शहज़ाद क़मर

अपने रोज़ ओ शब का आलम कर्बला से कम नहीं

शहज़ाद क़मर

शिकस्ता छत में परिंदों को जब ठिकाना मिला

शहज़ाद नय्यर

सितारे इस क़दर देखे कि आँखें बुझ गईं अपनी

शहज़ाद अहमद

शायद इसी बाइस हुईं पत्थर मिरी आँखें

शहज़ाद अहमद

नक़्श-ए-हैरत बन गई दुनिया सितारों की तरह

शहज़ाद अहमद

फ़लक से घूरती हैं मुझ को बे-शुमार आँखें

शहज़ाद अहमद

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