आसमाँ Poetry (page 12)

डूबते जाते थे तारे बादबाँ रौशन हुआ

सईदुल ज़फर चुग़ताई

अंजाम

सईद क़ैस

ये हादसा भी तो कुछ कम न था सबा के लिए

सईद अहमद अख़्तर

यूँ तो हर एक शख़्स ही तालिब समर का है

सादिक़ नसीम

सितारे सो गए तो आसमाँ कैसा लगेगा

साबिर ज़फ़र

सब सितम याद हैं सारी हमदर्दियाँ याद हैं

साबिर ज़फ़र

तमाम मोजज़े सारी शहादतें ले कर

साबिर वसीम

ख़िज़ाँ से सीना भरा हो लेकिन तुम अपना चेहरा गुलाब रखना

साबिर वसीम

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

और मोड़ ने कहा

साबिर दत्त

तुझ से दामन-कशाँ नहीं हूँ मैं

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

रू-ए-ज़मीं नहीं कि सर-ए-आसमाँ नहीं

रोहित सोनी ‘ताबिश’

सवेरा

रियाज़ लतीफ़

एक न्यूक्लेयर नज़्म

रियाज़ लतीफ़

हर एक ख़लिया को आईना घर बनाते हुए

रियाज़ लतीफ़

ज़रा जो हम ने उन्हें आज मेहरबाँ देखा

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कोई बात है सुनता न बाग़बाँ मेरी

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कहाँ लगी ये कहाँ लगी जो क़फ़स से शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठा

रियाज़ ख़ैराबादी

वो हों मुट्ठी में उन की दिल हो हम हों

रियाज़ ख़ैराबादी

उतरी है आसमाँ से जो कल उठा तो ला

रियाज़ ख़ैराबादी

थका ले और दौर-ए-आसमाँ तक

रियाज़ ख़ैराबादी

सितम-ए-ना-रवा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

रहे हम आशियाँ में भी तो बर्क़-ए-आशियाँ हो कर

रियाज़ ख़ैराबादी

मुँह ज़ेर-ए-ताक खोला वाइज़ बहुत ही चूका

रियाज़ ख़ैराबादी

जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह

रियाज़ ख़ैराबादी

गुलों के पर्दे में शक्लें हैं मह-जबीनों की

रियाज़ ख़ैराबादी

बात दिल की ज़बान पर आई

रियाज़ ख़ैराबादी

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

अल्लाह के भी घर से है कू-ए-बुताँ अज़ीज़

रिन्द लखनवी

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