अश्क Poetry (page 12)

तआ'क़ुब मेरा ख़ुशबू कर रही थी

सलमा शाहीन

ज़ख़्म-दर-ज़ख़्म सुख़न और भी होता है वसीअ

सलीम सिद्दीक़ी

ख़्वाहिश-ए-तख़्त न अब दिरहम-ओ-दीनार की गूँज

सलीम सिद्दीक़ी

फ़र्श-ए-ज़मीं पे बर्ग-ए-ख़िज़ानी का रंग है

सलीम शाहिद

वहशत निगार लम्हे आहू क़तार लम्हे

सलीम मुहीउद्दीन

तारे जो कभी अश्क-फ़िशानी से निकलते

सलीम कौसर

शाम ढलते ही तिरे ध्यान में आ जाता हूँ

सलीम फ़िगार

चेहरे पे उस के अश्क की तहरीर बन गई

सलीम बेताब

ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है

सलीम अहमद

बू-ए-गुल बाद-ए-सबा लाई बहुत देर के बा'द

सलाम संदेलवी

हम ऐसे लोग जल्द असीर-ए-ख़िज़ाँ हुए

सलाम मछली शहरी

ग़म पर हैं तअ'ना-ज़न तो ख़ुशी भी निभाइए

सलाम मछली शहरी

क़ासिद तिरे बार बार आए

सख़ी लख़नवी

इश्क़ करने में दिल भी क्या है शोख़

सख़ी लख़नवी

दिखाई देंगी सभी मुम्किनात काग़ज़ पर

सज्जाद बलूच

तो यूँ कहो ना दिलों का शिकार करना है

सज्जाद बाबर

जो महव-ए-हालात नहीं है

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

इतने दुखी हैं हम को मसर्रत भी ग़म बने

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

सुब्ह-ए-इशरत ज़िंदगी की शाम हो कर रह गई

सैफ़ बिजनोरी

जान-ए-तन्हा पे गुज़र जाएँ हज़ारों सदमे

साहिर लुधियानवी

यकसूई

साहिर लुधियानवी

पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने

साहिर लुधियानवी

ख़्वाब देखे थे सुहाने कितने

साहिर होशियारपुरी

समद को सरापा सनम देखते हैं

साहिर देहल्वी

मस्त-ए-निगाह-ए-नाज़ का अरमाँ निकालिए

साहिर देहल्वी

इस बे तुलूअ' शब में क्या तालेअ'-आज़माई

सहबा अख़्तर

हम दिल की निगाहों से जहाँ देख रहे हैं

सहर महमूद

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

अब न आएँगे रूठने वाले

साग़र सिद्दीक़ी

मुस्कुराओ बहार के दिन हैं

साग़र सिद्दीक़ी

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