बाम Poetry (page 13)

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे

बेख़ुद देहलवी

कर लिया दिन में काम आठ से पाँच

बासिर सुल्तान काज़मी

मिसाल-ए-तार-ए-नज़र क्या नज़र नहीं आता

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हम ज़र्रे हैं ख़ाक-ए-रहगुज़र के

बाक़ी सिद्दीक़ी

उदास बाम है दर काटने को आता है

बाक़ी अहमदपुरी

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सैर में तेरी है बुलबुल बोस्ताँ बे-कार है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दीवानगी की राह में गुम-सुम हुआ न था!

बाक़र मेहदी

हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे

ज़फ़र

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

मो'तबर से रिश्तों का साएबान रहने दो

अज़रा नक़वी

दिल सोया हुआ था मुद्दत से ये कैसी बशारत जागी है

अज़्म बहज़ाद

एक मंज़र एक आलम

अज़ीज़ क़ैसी

जाम ख़ाली जहाँ नज़र आया

अज़ीज़ लखनवी

खुला ये दिल पे कि तामीर-ए-बाम-ओ-दर है फ़रेब

अज़ीज़ हामिद मदनी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

लहू से उठ के घटाओं के दिल बरसते हैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

उतर कर पानियों में चाँद महव-ए-रक़्स रहता है

अज़हर नक़वी

रह गया दीदा-ए-पुर-आब का सामाँ हो कर

अज़हर नक़वी

कोई ऐसी बात है जिस के डर से बाहर रहते हैं

अज़हर नक़वी

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया

अज़हर इक़बाल

मुझ को भी जागने की अज़िय्यत से दे नजात

अज़हर इनायती

तमाम शख़्सियत उस की हसीं नज़र आई

अज़हर इनायती

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