बिहार Poetry (page 15)

आँखों में सौग़ात समेटे अपने घर आते हैं

सरवत हुसैन

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे

सरदार सोज़

काली घटा कब आएगी फ़स्ल-ए-बहार में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

उन बुतों से रब्त तोड़ा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

तुम्हें शब-ए-व'अदा दर्द-ए-सर था ये सब हैं बे-ए'तिबार बातें

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

की मय से हज़ार बार तौबा

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

काली घटा कब आएगी फ़स्ल-ए-बहार में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

देखा किसी का हम ने न ऐसा सुना दिमाग़

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

है तिरा इंतिज़ार गुलशन में

सरदार अंजुम

वस्ल की उम्मीद बढ़ते बढ़ते थक कर रह गई

साक़िब लखनवी

इबरत-ए-दहर हो गया जब से छुपा मज़ार में

साक़िब लखनवी

हज़ार फूल लिए मौसम-ए-बहार आए

साक़िब लखनवी

हद-बंदी-ए-ख़िज़ाँ से हिसार-ए-बहार तक

साक़ी फ़ारुक़ी

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई

साक़ी फ़ारुक़ी

शेर-इमदाद-अली का मेडक

साक़ी फ़ारुक़ी

यहीं कहीं पे कभी शोला-कार मैं भी था

साक़ी फ़ारुक़ी

वो दुख जो सोए हुए हैं उन्हें जगा दूँगा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं वो हूँ जिस पे अब्र का साया पड़ा नहीं

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं एक रात मोहब्बत के साएबान में था

साक़ी फ़ारुक़ी

कुछ भी समझ न पाओगे मेरे बयान से

संजय मिश्रा शौक़

फ़ज़ा-ए-ज़ेहन की जलती हवा बदलने तक

संजय मिश्रा शौक़

कब इस से क़ब्ल नज़र में गुल-ए-मलाल खिला

समीना राजा

सीमिया

सलमान अंसारी

हँस दे तो खिले कलियाँ गुलशन में बहार आए

सलीम रज़ा रीवा

मंज़िल-ए-बे-जहत की ख़ैर सई-ए-सफ़र है राएगाँ

सलीम अहमद

कल नशात-ए-क़ुर्ब से मौसम बहार-अंदाज़ा था

सलीम अहमद

क्या इसी को बहार कहते हैं

सलाम संदेलवी

ख़ुशी के फूल खिले थे तुम्हारे साथ कभी

सलाम संदेलवी

बू-ए-गुल बाद-ए-सबा लाई बहुत देर के बा'द

सलाम संदेलवी

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