बाज़ार Poetry (page 18)

आग जो दिल में लगी है वो बुझा दी जाए

असरा रिज़वी

अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे

असलम महमूद

दोस्ती को आम करना चाहता है

असलम हबीब

हंगामा-ए-हस्ती से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

असलम फ़र्रुख़ी

ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल

असलम अंसारी

अपना घर बाज़ार में क्यूँ रख दिया

अासिफ़ा निशात

जो ज़िंदगी बची है उसे ख़ार क्या करें

अशरफ़ शाद

दे आया अपनी जान भी दरबार-ए-इश्क़ में

अशरफ़ शाद

चाँद तारों से भरा ये आसमाँ दे जाऊँगा

अशरफ़ शाद

आलम में अगर इश्क़ का बाज़ार न होता

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

घर वापसी

अशोक लाल

हैरत है वो ख़ून की बातें करते हैं

अशफ़ाक़ रशीद मंसूरी

बाग़ में फूल खिले मौसम-ए-सौदा आया

असीर लखनवी

इश्क़ की गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ से लाऊँ

असर लखनवी

आप बिक जाए कोई ऐसा ख़रीदार न था

असर लखनवी

सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश

असद रज़ा

राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है

असद रज़ा

किस क़यामत का है बाज़ार तिरे कूचे में

आरज़ू सहारनपुरी

पियूँ ही क्यूँ जो बुरा जानूँ और छुपा के पियूँ

आरज़ू लखनवी

हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की

आरज़ू लखनवी

प्यास हर ज़र्रा-ए-सहरा की बुझाई गई है

अरशद जमाल 'सारिम'

कुछ दर्जा और गर्मी-ए-बाज़ार हो बुलंद

अरशद जमाल हश्मी

ख़रीदारी-ए-जिंस-ए-हुस्न पर रग़बत दिलाता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

यार के नर्गिस-ए-बीमार का बीमार रहा

अरशद अली ख़ान क़लक़

रग-ओ-पै में भरा है मेरे शोर उस की मोहब्बत का

अरशद अली ख़ान क़लक़

नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से

अरशद अली ख़ान क़लक़

दफ़्तर जो गुलों के वो सनम खोल रहा है

अरशद अली ख़ान क़लक़

जिंस-ए-मख़लूत हैं और अपने ही आज़ार में हैं

अरशद अब्दुल हमीद

वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया

अर्श सिद्दीक़ी

वो मेरे शहर में आया हुआ है

आरिफ़ इशतियाक़

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