दूर Poetry (page 64)

नुमाइश में

असरार-उल-हक़ मजाज़

मज़दूरों का गीत

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ाना-ब-दोश

असरार-उल-हक़ मजाज़

बोल! अरी ओ धरती बोल!

असरार-उल-हक़ मजाज़

वो नक़ाब आप से उठ जाए तो कुछ दूर नहीं

असरार-उल-हक़ मजाज़

अनजाने लोगों को हर सू चलता फिरता देख रहा हूँ

असरार ज़ैदी

बकरा

असरार जामई

परदेसी का ख़त

असरा रिज़वी

मैं सच तो कह दूँ पर उस को कहीं बुरा न लगे

असरा रिज़वी

दर्द की जोत मिरे दिल में जगाने वाले

असरा रिज़वी

सोच की उलझी हुई झाड़ी की जानिब जो गई

असलम कोलसरी

रफ़ीक़ दोस्त मुहिब मुझ को शाक़ सब ही थे

असलम हनीफ़

किसी तरह न तिलिस्म-ए-सुकूत टूट सका

असलम आज़ाद

वो क्या है कौन है ये तो ज़रा बता मुझ को

असलम आज़ाद

कहीं पे क़ुर्ब की लज़्ज़त का इक़्तिबास नहीं

असलम आज़ाद

कहीं पे क़ुर्ब की लज़्ज़त का इक़्तिबास नहीं

असलम आज़ाद

हर सू है तारीकी छाई तुम भी चुप और हम भी चुप

असलम आज़ाद

पौ फटते ही ट्रेन की सीटी जब कानों में गूँजती है

आसिमा ताहिर

मकाँ से दूर कहीं ला-मकाँ से होता है

आसिम वास्ती

अगर चुभती हुई बातों से डरना पड़ गया तो

आसिम वास्ती

ये न आने के बहाने हैं सभी वर्ना मियाँ

आसिफ़ुद्दौला

किस क़दर दर्द के शब करता था मज़कूर तिरा

आसिफ़ुद्दौला

सदियों से अजनबी

अासिफ़ शफ़ी

मक़्सूद-अली-'दीवाना'

आसिफ़ रज़ा

माँ

आसिफ़ रज़ा

दूर की शहज़ादी

आसिफ़ रज़ा

ये दिल में वसवसा क्या पल रहा है

आसिफ़ रज़ा

अहद-ए-वफ़ा न याद दिलाएँ तो क्या करें

अशरफ़ रफ़ी

हैफ़ दिल में तिरे वफ़ा न हुई

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

नेकी बदी की अब कोई मीज़ान ही नहीं

अशोक साहनी

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