दर Poetry (page 25)

तेरा कूचा तिरा दर तेरी गली काफ़ी है

शाहिद कबीर

नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

न ख़ुदा है न नाख़ुदा है कोई

शाहिद इश्क़ी

लाए तो नक़्द-ए-जाँ सर-ए-बाज़ार क्या कहें

शाहिद इश्क़ी

दिए हैं रंज सारे आगही ने

शाहिद इश्क़ी

महका है गुल-ए-ख़ून-ए-वफ़ा जानिए क्या हो

शाहिद अख़्तर

किसी की ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन की बात हुई

शाहिद अख़्तर

रंग-ए-नज़र से हुस्न-ए-तमन्ना निखार के

शाहीन सिद्दीक़ी

ये हम कौन हैं

शाहीन मुफ़्ती

शहर-ए-ख़ूबाँ से जो हम अब भी गुज़र आते हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ख़्वाब खुलना है जो आँखों पे वो कब खुलता है

शाहीन अब्बास

ख़ुद में उतरें तो पलट कर वापस आ सकते नहीं

शाहीन अब्बास

कैसा कैसा दर पस-ए-दीवार करना पड़ गया

शाहीन अब्बास

झगड़े अपने भी हों जब चाक-गरेबानों के

शाहीन अब्बास

गुज़रे नहीं और गुज़र गए हम

शाहीन अब्बास

उदासी ने समाँ बाँधा हुआ है

शाहबाज़ रिज़्वी

ज़िंदगी शब के जज़ीरों से उधर ढूँडते हैं

शहबाज़ ख़्वाजा

वफ़ा का शौक़ ये किस इंतिहा में ले आया

शहबाज़ ख़्वाजा

जब भी कश्ती के मुक़ाबिल भँवर आता है कोई

शहाब सफ़दर

हवस-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर लिए बैठे हैं

शहाब जाफ़री

बे-सर-ओ-सामाँ कुछ अपनी तब्अ से हैं घर में हम

शहाब जाफ़री

वाँ कमर बाँधे हैं मिज़्गाँ क़त्ल पर दोनों तरफ़

शाह नसीर

तिरे है ज़ुल्फ़ ओ रुख़ की दीद सुब्ह-ओ-शाम आशिक़ का

शाह नसीर

तिरे दाँत सारे सफ़ेद हैं पए-ज़ेब पान से मल कर आ

शाह नसीर

इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में

शाह नसीर

दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा

शाह नसीर

बादा-कशी के सिखलाते हैं क्या ही क़रीने सावन-भादों

शाह नसीर

जूँ क़दम यार ने घर से मिरे दर पर रक्खा

शाह कमालउद्दीन कमाल

क्या कहूँ कब धुआँ नहीं उठता

शाह हुसैन नहरी

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