दर Poetry (page 27)

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

शाद अज़ीमाबादी

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

शाद अज़ीमाबादी

ज़ौक़-ए-नज़र को इज़्न-ए-नज़ारा न मिल सका

शबनम शकील

मिल बैठने के सारे क़रीनों की ख़ैर हो

शबनम शकील

कितने अंजान जज़ीरों में मुझे ले के चला

शबनम शकील

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

आईन-ए-वफ़ा इतना भी सादा नहीं होता

शबनम शकील

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

शबनम रूमानी

इतना एहसान और करता कौन

शबी फ़ारूक़ी

मैं रतजगों का सफ़ीर ठहरा था कितनी रातें गुज़ार आया

शब्बीर नकिद

ये तो सोचा ही नहीं उस को जुदा करते हुए

शबाना यूसुफ़

लौट आएगा किसी शाम यही लगता है

शबाना यूसुफ़

है कोई दर्द मुसलसल रवाँ-दवाँ मुझ में

शबाना यूसुफ़

सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया

शायर लखनवी

इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी

शानुल हक़ हक़्क़ी

बिखर जाएगी शाम आहिस्ता बोलो

शानुल हक़ हक़्क़ी

उठ गई उस की नज़र मैं जो मुक़ाबिल से उठा

शाद आरफ़ी

ब-पास-ए-एहतियात-ए-आरज़ू ये बार-हा हुआ

शाद आरफ़ी

एक हम हैं रात भर करवट बदलते ही कटी

सेहर इश्क़ाबादी

मेरी क़िस्मत से क़फ़स का या तो दर खुलता नहीं

सेहर इश्क़ाबादी

अजीब शाम थी जब लौट कर मैं घर आया

सीमान नवेद

ज़ात की दीवार बीचों-बीच इक दर वा हुआ

सीमाब ज़फ़र

रस्मन ही उन को नाला-ए-दिल की ख़बर तो हो

सीमाब अकबराबादी

जो मेरे तंगना-ए-दिल में तुझ को जल्वा-गर देखा

सीमाब अकबराबादी

हस्ती को मिरी मस्ती-ए-पैमाना बना दे

सीमाब अकबराबादी

दिल तेरे तग़ाफ़ुल से ख़बर-दार न हो जाए

सीमाब अकबराबादी

अब क्या बताऊँ मैं तिरे मिलने से क्या मिला

सीमाब अकबराबादी

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