दर Poetry (page 26)

कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क

शाह आसिम

तुम्हारी याद तो लिपटी है पूरे घर के मंज़र से

सगुफ़ता यासमीन

शक़ आफ़ियत-कनार किनारे को कर गई

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

रेग-ए-रवाँ पे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न देखना

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

क़ुर्बत-ए-हुस्न में भी दर्द के आसार मिले

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

लोग हैं मुंतज़िर-ए-नूर-ए-सहर मुद्दत से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ने तो यही मा'रका मारा है सफ़र में

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ख़राबे में बसर कर गए ख़ामोशी से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

पानियों से रेत पर जो आ गया मेरी तरह

शफ़ीउल्लाह राज़

सर में एक सौदा था बाम-ओ-दर बनाने का

शफ़ीक़ सलीमी

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई

शफ़ीक़ सलीमी

इन बला की आँधियों में इक शजर बाक़ी रहे

शफ़ीक़ सलीमी

बचा था एक जो वो राब्ता भी टूट गया

शफ़ीक़ सलीमी

अब जा कर एहसास हुआ है प्यार भी करना था

शफ़ीक़ सलीमी

यूँ तसव्वुर में बसर रात किया करते थे

शफ़ीक़ जौनपुरी

पर्दा पड़ा हुआ था ख़ुदी ने उठा दिया

शफ़ीक़ जौनपुरी

कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं

शफ़ीक़ जौनपुरी

मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन

शफ़क़ सुपुरी

मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन

शफ़क़ सुपुरी

मैं हम-नफ़स हूँ मुझे राज़-दाँ भी करना था

शफ़क़ सुपुरी

सोहबत-ए-वस्ल है मसदूद हैं दर हाए हिजाब

शाद लखनवी

ये सनम भी घटोर कितने हैं

शाद लखनवी

सदा रंग-ए-मीना चमकता रहा

शाद लखनवी

क़ौल उस दरोग़-गो का कोई भी सच हुआ है

शाद लखनवी

ख़त देखिए दीदार की सूझी ये नई है

शाद लखनवी

जों सब्ज़ा रहे उगते ही पैरों के तले हम

शाद लखनवी

गोश कर फ़रियाद-ए-आशिक़ जान कर

शाद लखनवी

गले लिपटे हैं वो बिजली के डर से

शाद लखनवी

न जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्ताक़ों का मेला था

शाद अज़ीमाबादी

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा

शाद अज़ीमाबादी

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