दर Poetry (page 24)

दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए

शहरयार

बहते दरियाओं में पानी की कमी देखना है

शहरयार

हुक्मराँ जब से हुईं बस्ती पे अफ़्वाहें वहाँ

शहराम सर्मदी

बदल जाएगा सब कुछ ये तमाशा भी नहीं होगा

शहराम सर्मदी

किसी से हाथ किसी से नज़र मिलाते हुए

शहनाज़ नूर

हवा के हौसले ज़ंजीर करना चाहता है

शहनाज़ नूर

रौशन आईनों में झूटे अक्स उतार गया

शहनवाज़ ज़ैदी

मेज़ पे चेहरा ज़ुल्फ़ें काग़ज़ पर

शहनवाज़ ज़ैदी

जब आफ़्ताब से चेहरा छुपा रही थी हवा

शहनवाज़ ज़ैदी

अक़्ल-ओ-दिल को मिला-जुला रखिए

शाहजहाँ बानो याद

उसे जब भी देखा बहुत ध्यान से

शाहिदा तबस्सुम

है शर्त क़ीमत-ए-हुनर भी अब तो रब्त-ए-ख़ास पर

शाहिदा तबस्सुम

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

चाँद के साथ जल उठी मैं भी

शाहिदा हसन

ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच

शाहिद ज़की

ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख

शाहिद ज़की

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है

शाहिद ज़की

बिछड़ गया था कोई ख़्वाब-ए-दिल-नशीं मुझ से

शाहिद ज़की

ज़ेहन में लगता है जब ख़ुश-रंग लफ़्ज़ों का हुजूम

शाहिद मीर

ख़ूँ का सैलाब था जो सर से अभी गुज़रा है

शाहिद माहुली

हर दर-ओ-दीवार पे लर्ज़ां कोई पैकर लगे

शाहिद माहुली

बाम-ओ-दर टूट गए बह गया पानी कितना

शाहिद माहुली

ज़मीं तश्कील दे लेते फ़लक ता'मीर कर लेते

शाहिद लतीफ़

ये जो रब्त रू-ब-ज़वाल है ये सवाल है

शाहिद लतीफ़

लोग हैरान हैं हम क्यूँ ये किया करते हैं

शाहिद लतीफ़

दूर सहरा में जहाँ धूप शजर रखती है

शाहिद लतीफ़

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

शाहिद कमाल

कूचा-ए-संग-ए-मलामत के सब आसार के साथ

शाहिद कमाल

फ़िक्र-ए-ईजाद में हूँ खोल नया दर कोई

शाहिद कमाल

धूप के ज़र्द जज़ीरों में नुमू ज़िंदा है

शाहिद कमाल

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