दर Poetry (page 22)

वो लोग आएँ जिन्हें हौसला ज़ियादा है

शकील जमाली

अब बंद जो इस अब्र-ए-गुहर-बार को लग जाए

शकील जमाली

इक आस का दिया तो दिल में जलाते जाओ

शकील ग्वालिआरी

ज़लज़ला

शकील बदायुनी

नुमाइश-ए-अलीगढ़

शकील बदायुनी

तौफ़-ए-हरम न देर की गहराइयों में है

शकील बदायुनी

शिकवे तिरे हुज़ूर किए जा रहा हूँ मैं

शकील बदायुनी

सर भी है पा-ए-यार भी शौक़-ए-सिवा को क्या हुआ

शकील बदायुनी

निगाह-ए-नाज़ का इक वार कर के छोड़ दिया

शकील बदायुनी

नसीब दर पे तिरे आज़माने आया हूँ

शकील बदायुनी

मिरी ज़िंदगी है ज़ालिम तिरे ग़म से आश्कारा

शकील बदायुनी

ख़ाना-ए-उम्मीद बे-नूर-ओ-ज़िया होने को है

शकील बदायुनी

जब कभी हम तिरे कूचे से गुज़र जाते हैं

शकील बदायुनी

हज़ार क़ैद-ए-ख़िज़ाँ से छुट कर बहार का आसरा करेंगे

शकील बदायुनी

दुनिया की रिवायात से बेगाना नहीं हूँ

शकील बदायुनी

बेकार गई आड़ तिरे पर्दा-ए-दर की

शकील बदायुनी

बस इक निगाह-ए-करम है काफ़ी अगर उन्हें पेश-ओ-पस नहीं है

शकील बदायुनी

घर के दीवार-ओ-दर पे शाम ही से

शकील आज़मी

ज़रा से ग़म के लिए जान से गुज़र जाना

शकील आज़मी

अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ

शकील आज़मी

रात के पिछले पहर

शकेब जलाली

लरज़ता दीप

शकेब जलाली

तू ने क्या क्या न ऐ ज़िंदगी दश्त ओ दर में फिराया मुझे

शकेब जलाली

मीठे चश्मों से ख़ुनुक छाँव से दूर

शकेब जलाली

क्या कहिए कि अब उस की सदा तक नहीं आती

शकेब जलाली

इस ख़ाक-दाँ में अब तक बाक़ी हैं कुछ शरर से

शकेब जलाली

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे

शकेब जलाली

जुनून-ए-इश्क़ की आमादगी ने कुछ न दिया

शाइस्ता सहर

रख़्त-ए-सफ़र

शाइस्ता मुफ़्ती

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