दर Poetry (page 21)

अजब लहजे में करते थे दर ओ दीवार बातें

शारिक़ कैफ़ी

सामने तेरे हूँ घबराया हुआ

शारिक़ कैफ़ी

ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है

शारिक़ कैफ़ी

होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या

शारिक़ कैफ़ी

क़ुदरत है तुर्फ़ा-कार तुझे कुछ ख़बर भी है

शारिक़ ईरायानी

गर दर-ए-हर्फ़-ए-सदाक़त ये नहीं था फिर क्यूँ

शारिब मौरान्वी

शहर में कैसा ख़तर लगता है

शरीफ़ अहमद शरीफ़

कुछ भी हो उस से जुदाई का सबब घर जाओ

शरीफ़ अहमद शरीफ़

अपने पस-मंज़र में मंज़र बोलते

शरर फ़तेह पुरी

उश्शाक़ के आगे न लड़ा ग़ैरों से आँखें

शरफ़ मुजद्दिदी

रात शहर और उस के बच्चे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

बैत-ए-अंकबूत

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

चेहरे का आफ़्ताब दिखाई न दे तो फिर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

सजे हुए बाम-ओ-दर से आगे की सोचता हूँ

शमशीर हैदर

ख़ुश-कुन ख़बर के धोके में रक्खा गया मुझे

शमशीर हैदर

दूर फ़ज़ा में एक परिंदा खोया हुआ उड़ानों में

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

चाँद तारों ने भी जब रख़्त-ए-सफ़र खोला है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

चोर दरवाज़ा

शम्स फ़रीदी

दीवार की सूरत था कभी दर की तरह था

शमीम रविश

ज़मीं पे रह के दिमाग़ आसमाँ से मिलता है

शमीम जयपुरी

ये दौर-ए-अहल-ए-हवस है करम से काम न ले

शमीम जयपुरी

चाहा बयाँ करूँ जों है मेरे ख़याल में

शमीम हाश्मी

वो एक शोर सा ज़िंदाँ में रात भर क्या था

शमीम हनफ़ी

हिज्र का क़िस्सा बहुत लम्बा नहीं बस रात भर है

शमीम हनफ़ी

अँधेरी शब है कहाँ रूठ कर वो जाएगा

शमीम फ़ारूक़ी

आसमाँ का रंग मेरी ज़ात में घुल जाएगा

शमीम फ़ारूक़ी

अहम आँखें हैं या मंज़र खुले तो

शमीम अब्बास

इस घर में मिरे साथ बसर कर के तो देखो

शकील शम्सी

तन्हाई

शकील जाज़िब

आसमाँ था तुम थे या मेरा सितारा कौन था

शकील जाज़िब

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