दर Poetry (page 19)
मैं जब्हा सा हूँ उस दर-ए-आली-मक़ाम का
शोला अलीगढ़ी
वहशत का कहीं असर नहीं है
शोहरत बुख़ारी
साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो
शोहरत बुख़ारी
हम पी गए सब हिले न लब तक
शोहरत बुख़ारी
हम पी गए सब हिले न अब तक
शोहरत बुख़ारी
दीवार-ओ-दर पे कृष्ण की लीला के नक़्श हैं
शोभा कुक्कल
सारा जहान छोड़ के तुम से ही प्यार था
शोभा कुक्कल
काटे हैं दिन हयात के लाचार की तरह
शोभा कुक्कल
क्या ख़त्म न होगी कभी सहरा की हुकूमत
शोएब निज़ाम
टूटे हुए ख़्वाबों के तलबगार भी आए
शोएब निज़ाम
मेरे क़दमों पर निगूँ मेरा ही सर है भी तो क्या
शोएब निज़ाम
किसी नादीदा शय की चाह में अक्सर बदलते हैं
शोएब निज़ाम
चश्म-ए-गर्दूं फिर तमाज़त अपनी बरसाने लगी
शोएब निज़ाम
अब्र का टुकड़ा कोई बाला-ए-बाम आता हुआ
शोएब निज़ाम
नाला-ए-दिल की सदा दीवार में है दर में है
शोएब अहमद मेरठी नुद्रत
यार को रग़बत-ए-अग़्यार न होने पाए
शिबली नोमानी
मिरी आह बे-असर है मैं असर कहाँ से लाऊँ
शेवन बिजनौरी
सोज़-ए-अलम से दूर हुआ जा रहा हूँ मैं
शेरी भोपाली
है ऐन-ए-वस्ल में भी मिरी चश्म सू-ए-दर
ज़ौक़
ज़ख़्मी हूँ तिरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से
ज़ौक़
उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है
ज़ौक़
क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं
ज़ौक़
कहाँ तलक कहूँ साक़ी कि ला शराब तो दे
ज़ौक़
हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का
ज़ौक़
दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे
ज़ौक़
बज़्म में ज़िक्र मिरा लब पे वो लाए तो सही
ज़ौक़
हम ज़िंदगी-शनास थे सब से जुदा रहे
शहपर रसूल
एक आसेब है हर इक घर में
शीन काफ़ निज़ाम
रीत पर जितने भी नविश्ते हैं
शीन काफ़ निज़ाम
पाँव में दूर का सफ़र चमके
शीन काफ़ निज़ाम
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