दर Poetry (page 17)

कुछ डूबता उभरता सा रहता है सामने

सुल्तान अख़्तर

कोई भी शहर में खुल कर न बग़ल-गीर हुआ

सुल्तान अख़्तर

ख़्वाब आँखों से चुने नींद को वीरान किया

सुल्तान अख़्तर

ख़ाना-बर्बाद हुए बे-दर-ओ-दीवार रहे

सुल्तान अख़्तर

ख़ाक उड़ती है ख़रीदार कहाँ खो गए हैं

सुल्तान अख़्तर

झूट रौशन है कि सच्चाई नहीं जानते हैं

सुल्तान अख़्तर

जा चुका तूफ़ान लेकिन कपकपी है

सुल्तान अख़्तर

हर इक लम्हा हमें हम से जुदा करती हुई सी

सुल्तान अख़्तर

दर-ब-दर की ख़ाक पेशानी पे मल कर आएगा

सुल्तान अख़्तर

अपनी तहज़ीब की दीवार सँभाले हुए हैं

सुल्तान अख़्तर

वो सर से पाँव तलक चाहतों में डूबा था

सुलेमान ख़ुमार

न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में घास का मंज़र भी मुझे चाहिए है

सुलेमान ख़ुमार

बीमार सा है जिस्म-ए-सहर काँप रहा है

सुलेमान ख़ुमार

तिरे हिरमाँ-नसीबों की भी क्या तक़दीर है साक़ी

सुलैमान आसिफ़

कहाँ तेवर हैं उन में अब वो कल के

सुहैल काकोरवी

इन दिनों तेज़ बहुत तेज़ है धारा मेरा

सुहैल अख़्तर

सफ़र में अब भी आदतन सराब देखता हूँ मैं

सुहैल अहमद ज़ैदी

ख़ैर उस से न सही ख़ुद से वफ़ा कर डालो

सुहैल अहमद ज़ैदी

इम्कान खुले दर का हर आन बहुत रक्खा

सुहैल अहमद ज़ैदी

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

ज़र्द-चमेली

सूफ़िया अनजुम ताज

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

ज़िंदगी क्या है इक सफ़र के सिवा

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

तुझ को आते ही नहीं छुपने के अंदाज़ अभी

सूफ़ी तबस्सुम

सुकून-ए-क़ल्ब ओ शकेब-ए-नज़र की बात करो

सूफ़ी तबस्सुम

निगाहें दर पे लगी हैं उदास बैठे हैं

सूफ़ी तबस्सुम

Collection of Hindi Poetry. Get Best Hindi Shayari, Poems and ghazal. Read shayari Hindi, poetry by famous Hindi and Urdu poets. Share poetry hindi on Facebook, Whatsapp, Twitter and Instagram.