दर Poetry (page 15)

ज़वाल की आख़िरी चीख़

तबस्सुम काश्मीरी

जुनूँ में और ख़िरद में दर-हक़ीक़त फ़र्क़ इतना है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

शबाब-ए-हुस्न है बर्क़-ओ-शरर की मंज़िल है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

मिरी सहबा-परस्ती मोरीद-ए-इल्ज़ाम है साक़ी

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

जल्वा पाबंद-ए-नज़र भी है नज़र-साज़ भी है

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

एक तुम ही नहीं दुनिया में जफ़ाकार बहुत

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

किसी गुल में नहीं पाने की तू बू-ए-वफ़ा हरगिज़

ताबाँ अब्दुल हई

ऐसा कहाँ हुबाब कोई चश्म-ए-तर कि हम

ताबाँ अब्दुल हई

आरज़ू है मैं रखूँ तेरे क़दम पर गर जबीं

ताबाँ अब्दुल हई

मंज़िलों उस को आवाज़ देते रहे मंज़िलों जिस की कोई ख़बर भी न थी

ताब असलम

आमद आमद है ख़िज़ाँ की जाने वाली है बहार

तअशशुक़ लखनवी

न डरे बर्क़ से दिल की है कड़ी मेरी आँख

तअशशुक़ लखनवी

जोश पर थीं सिफ़त-ए-अब्र-ए-बहारी आँखें

तअशशुक़ लखनवी

अपनी फ़रहत के दिन ऐ यार चले आते हैं

तअशशुक़ लखनवी

ईद के दिन जाइए क्यूँ ईद-गाह

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ईद है हम ने भी जाना कि न होती गर ईद

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

हक़ ये है कि का'बे की बिना भी न पड़ी थी

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

तेरे दर से मैं उठा लेकिन न मेरा दिल उठा

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मिल जाएँ अज़दहाम में हम ही ये हम से दूर

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मैं ने कहा कि दा'वा-ए-उलफ़त मगर ग़लत

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

कलाम-ए-सख़्त कह कह कर वो क्या हम पर बरसते हैं

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जाँ-फ़िशानी का वाँ हिसाब अबस

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

हम को हवस-ए-जल्वा-गाह-ए-तूर नहीं है

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

साँस का अपनी रग-ए-जाँ से गुज़र होने तक

सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद

रिवाज-ओ-रस्म का उस को हुनर भी आता है

सय्यद मुनीर

अब और तब

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

तिरी आँखों को तेरे हुस्न का दर जाना था

सय्यद काशिफ़ रज़ा

सग-ए-जमाल हूँ गर्दन से बाँध कर ले जा

सय्यद काशिफ़ रज़ा

क़रार दीदा-ओ-दिल में रहा नहीं है बहुत

सय्यद काशिफ़ रज़ा

बहुत से दर्द थे पर ख़ुद को जोड़ कर रक्खा

सय्यद काशिफ़ रज़ा

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