दर Poetry (page 16)

शिकवा गर कीजे तो होता है गुमाँ तक़्सीर का

सय्यद हामिद

तमाशा-गाह-ए-आलम पर्दा-दार रू-ए-ज़ेबा है

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

पहले से देखना कहीं बेहतर बनाएँगे

सय्यद अमीनुल हसन मोहानी बिस्मिल

पेच-दर-पेच सवालात में उलझे हुए हैं

सय्यद अमीन अशरफ़

किसी ख़याल की रौ में था मुस्कुराते हुए

सय्यद अमीन अशरफ़

ख़िरद ऐ बे-ख़बर कुछ भी नहीं है

सय्यद अमीन अशरफ़

जो डर अपनों से है ग़ैरों से वो डर हो नहीं सकता

सय्यद अमीन अशरफ़

हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से नहीं जाने वाला

सय्यद अमीन अशरफ़

शोला-ए-इश्क़ में जो दिल को तपाँ रखते हैं

सय्यद अहमद शमीम

सीने में आग आँख सू-ए-दर लगी रहे

सय्यद अाग़ा अली महर

ये अर्ज़-ए-शौक़ है आराइश-ए-बयाँ भी तो हो

सय्यद आबिद अली आबिद

सब के जल्वे नज़र से गुज़रे हैं

सय्यद आबिद अली आबिद

रेत की तरह किनारों पे हैं डरने वाले

सय्यद आबिद अली आबिद

कहो बुतों से कि हम तब्अ सादा रखते हैं

सय्यद आबिद अली आबिद

किरन इक मो'जिज़ा सा कर गई है

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर में ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

दिन के पहले पहर मैं ही अपना बिस्तर छोड़ कर

स्वप्निल तिवारी

फ़क़ीरों पे अपने करम इक ज़रा कर

सुरूर जहानाबादी

सुनी है रौशनी के क़त्ल की जब से ख़बर मैं ने

सुरूर अम्बालवी

अपनी अना के गुम्बद-ए-बे-दर में बंद है

सूरज तनवीर

आँख लग जाती है फिर भी जागता रहता हूँ मैं

सूरज नारायण

हाए वो याद कहाँ है कि ख़ुदा ख़ैर करे

सुनील कुमार जश्न

सो उस को छोड़ दिया उस ने जब वफ़ा नहीं की

सुल्तान सुकून

सो उस को छोड़ दिया उस ने जब वफ़ा नहीं की

सुल्तान सुकून

जो नज़र आता नहीं दीवार में दर और है

सुलतान रशक

अजब इंसान हूँ ख़ुश-फ़हमियों के घर में रहता हूँ

सुलतान रशक

वही बे-सबब से निशाँ हर तरफ़

सुल्तान अख़्तर

तिलिस्म-ए-कार-ए-जहाँ का असर तमाम हुआ

सुल्तान अख़्तर

सिलसिला मेरे सफ़र का कभी टूटा ही नहीं

सुल्तान अख़्तर

सरसब्ज़ मौसमों का असर ले गया कोई

सुल्तान अख़्तर

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