दर Poetry (page 18)

हज़ार गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर से गुज़रे हैं

सूफ़ी तबस्सुम

दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा

सुदर्शन फ़ाकिर

मुझे मालूम है

सुबोध लाल साक़ी

अब ख़िज़ाँ आए या बहार आए

सोज़ नजीबाबादी

तेरा ही ज़िक्र हरसू तिरा ही बयाँ मिले

सिया सचदेव

यारब सराब-ए-अहल-ए-हवस से नजात दे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

शौक़ रातों को है दर पे कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ख़बर रिहाई की मिल चुकी है चराग़ फूलों के जल रहे हैं

सिराज लखनवी

अच्छा क़िसास लेना फिर आह-ए-आतिशीं से

सिराज लखनवी

इश्क़ की जो लगन नहीं देखा

सिराज औरंगाबादी

फ़जर उठ यार का दीदार करनाँ

सिराज औरंगाबादी

दिलदार की कशिश ने ऐंचा है मन हमारा

सिराज औरंगाबादी

देखा है जिस ने यार के रुख़्सार की तरफ़

सिराज औरंगाबादी

ज़ुल्मत-ए-शब ही सहर हो जाएगी

सिकंदर अली वज्द

वो सर्द धूप रेत समुंदर कहाँ गया

सिदरा सहर इमरान

ज़बान-ए-ख़ल्क़ को चुप आस्तीं को तर पा कर

सिद्दीक़ मुजीबी

प्यासा जो मेरे ख़ूँ का हुआ था सो ख़्वाब था

सिद्दीक़ मुजीबी

बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

आग को फूल कहे जाएँ ख़िर्द-मंद अपने

सिद्दीक़ शाहिद

लब-ए-इज़हार पे जब हर्फ़-ए-गवाही आए

सिब्त अली सबा

जलते जलते बुझ गई इक मोम-बत्ती रात को

सिब्त अली सबा

सू-ए-सहरा ही मुझे ले गई वहशत मेरी

श्याम सुंदर लाल बर्क़

अबस है दूरी का उस के शिकवा बग़ल में अपने वो दिल-रुबा है

श्याम सुंदर लाल बर्क़

तेरे मिलने से हम को ख़ुशी मिल गई

श्याम सुन्दर नंदा नूर

जाता है यार सैर को गुलज़ार की तरफ़

शऊर बलगिरामी

घर में बेचैनी हो तो अगले सफ़र की सोचना

शुजा ख़ावर

गरचे बादल पानी बरसाता हुआ घर घर फिरा

शुजा ख़ावर

सहरा में कड़ी धूप का डर होते हुए भी

शोज़ेब काशिर

बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर

शोज़ेब काशिर

वो जिस के दिल में निहाँ दर्द दो-जहाँ का था

शोला हस्पानवी

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