दर Poetry (page 20)

मौज-ए-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए

शीन काफ़ निज़ाम

किसी के साथ अब साया नहीं है

शीन काफ़ निज़ाम

बूँद बन बन के बिखरता जाए

शीन काफ़ निज़ाम

अब तेरे इंतिज़ार की आदत नहीं रही

शाज़िया अकबर

ज़मीं का क़र्ज़

शाज़ तमकनत

बे-नंग-ओ-नाम

शाज़ तमकनत

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

सोज़-ए-दुआ से साज़-ए-असर कौन ले गया

शाज़ तमकनत

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

मैं लौट आऊँ कहीं तू ये सोचता ही न हो

शाज़ तमकनत

कुछ अजब आन से लोगों में रहा करते थे

शाज़ तमकनत

जिस तरफ़ जाऊँ उधर आलम-ए-तन्हाई है

शाज़ तमकनत

जिन ज़ख़्मों पर था नाज़ हमें वो ज़ख़्म भी भरते जाते हैं

शाज़ तमकनत

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

हालात के कोहना दर-ओ-दीवार से निकलें

शायान क़ुरैशी

था बंद वो दर फिर भी मैं सौ बार गया था

शौक़ क़िदवाई

लब चुप हैं तो क्या दिल गिला-पर्दाज़ नहीं है

शौक़ क़िदवाई

नई बज़्म-ए-ऐश-ओ-नशात में ये मरज़ सुना है कि आम है

शौक़ बहराइची

किया जो ए'तिबार उन पर मरीज़-ए-शाम-ए-हिज्राँ ने

शौक़ बहराइची

गिन के देता है बला-नोशों को पैमाना अभी

शौक़ बहराइची

हो राहज़न की हिदायत कि राहबर के फ़रेब

शौकत थानवी

मिरे लिए मिरी पर्वाज़ के लिए कम है

शौकत मेहदी

एक आसेब का साया था जो सर से उतरा

शौकत काज़मी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

ये दस्त-ए-नाज़ में ख़त तर्जुमान किस का है

शातिर हकीमी

मिरे दिल पे तेरा क़ब्ज़ा मिरा इख़्तियार तू है

शातिर हकीमी

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

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