दर Poetry (page 23)

तू सुब्ह-दम न नहा बे-हिजाब दरिया में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

शहर में फिरता है वो मय-ख़्वार मस्त

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रखता हूँ मैं हक़ पर नज़र कोई कुछ कहो कोई कुछ कहो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हम को कब इंतिज़ार है फ़स्ल-ए-बहार हो न हो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दुनिया ख़याल-ओ-ख़्वाब है मेरी निगाह में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

बे तिरे जान न थी जान मिरी जान के बीच

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आशिक़ का जहाँ में घर न देखा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ख़्वाह महसूर ही कर दें दर-ओ-दीवार मुझे

शहज़ाद क़मर

सोचिए गर उसे हर-नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

सोचिए गर उसे हर नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

रात के वक़्त कोई गीत सुनाती है हवा

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

न पूछ मेरी कहानी कहाँ से निकली है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

तन्हाई में आ जाती हैं हूरें मिरे घर में

शहज़ाद अहमद

कुछ तज़किरा-ए-हुस्न से रौशन थे दर-ओ-बाम

शहज़ाद अहमद

आज़ाद था मिज़ाज तो क्यूँ घर बना लिया

शहज़ाद अहमद

अन-कही

शहज़ाद अहमद

प्यार के रंग-महल बरसों में तय्यार हुए

शहज़ाद अहमद

जल भी चुके परवाने हो भी चुकी रुस्वाई

शहज़ाद अहमद

जाने किस सम्त से हवा आई

शहज़ाद अहमद

इसी बाइस ज़माना हो गया है उस को घर बैठे

शहज़ाद अहमद

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ

शहज़ाद अहमद

इबलीस भी रख लेते हैं जब नाम फ़रिश्ते

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

बिखरे हुए तारों से मिरी रात भरी है

शहज़ाद अहमद

मौत

शहरयार

ख़्वाब का दर बंद है

शहरयार

नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता

शहरयार

मिशअल-ए-दर्द फिर एक बार जला ली जाए

शहरयार

खुले जो आँख कभी दीदनी ये मंज़र हैं

शहरयार

हँस रहा था मैं बहुत गो वक़्त वो रोने का था

शहरयार

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