दर Poetry (page 62)

शीशों का मसीहा कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

निसार मैं तेरी गलियों के

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मेरे मिलने वाले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लौह-ओ-क़लम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जिस रोज़ क़ज़ा आएगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जरस-ए-गुल की सदा

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जब तेरी समुंदर आँखों में

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इश्क़ अपने मुजरिमों को पा-ब-जौलाँ ले चला

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गाँव की सड़क

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

एक तराना मुजाहिदीन-ए-फ़िलिस्तीन के लिए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

एक मंज़र

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दो इश्क़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दस्त-ए-तह-ए-संग-आमदा

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दर-ए-उमीद के दरयूज़ा-गर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ब्लैक-आउट

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ऐ शाम मेहरबाँ हो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आरज़ू

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज शब कोई नहीं है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुझे पुकारा है बे-इरादा

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सुब्ह की आज जो रंगत है वो पहले तो न थी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिर हरीफ़-ए-बहार हो बैठे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

न अब रक़ीब न नासेह न ग़म-गुसार कोई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुछ मोहतसिबों की ख़ल्वत में कुछ वाइ'ज़ के घर जाती है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

किस हर्फ़ पे तू ने गोश-ए-लब ऐ जान-ए-जहाँ ग़म्माज़ किया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जमेगी कैसे बिसात-ए-याराँ कि शीशा ओ जाम बुझ गए हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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