दर Poetry (page 63)

जैसे हम-बज़्म हैं फिर यार-ए-तरह-दार से हम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हैराँ है जबीं आज किधर सज्दा रवा है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

''आप की याद आती रही रात भर''

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज यूँ मौज-दर-मौज ग़म थम गया इस तरह ग़म-ज़दों को क़रार आ गया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

क्यूँ आसमान-ए-हिज्र के तारे चले गए

फ़ैसल फेहमी

शामियानों की वज़ाहत तो नहीं की गई है

फ़ैसल अजमी

रख़्त-ए-सफ़र है इस में क़रीना भी चाहिए

फ़ैसल अजमी

इन लोगों में रहने से हम बेघर अच्छे थे

फ़ैसल अजमी

चादर और चार-दीवारी

फ़हमीदा रियाज़

अबद

फ़हमीदा रियाज़

आलम-ए-बर्ज़ख़

फ़हमीदा रियाज़

परिंदे सहमे सहमे उड़ रहे हैं

फ़हमी बदायूनी

राहदारी में गूँजती नज़्म

फ़हीम शनास काज़मी

''ला'' भी है एक गुमाँ

फ़हीम शनास काज़मी

भगत-सिंह के नाम

फ़हीम शनास काज़मी

आहिस्ता से गुज़रो

फ़हीम शनास काज़मी

उस ने पूछा भी मगर हाल छुपाए गए हम

फ़हीम शनास काज़मी

रस्ते में शाम हो गई क़िस्सा तमाम हो चुका

फ़हीम शनास काज़मी

दिल ओ निगाह में उस को अगर नहीं रहना

फ़हीम शनास काज़मी

किसी के दर पे सज्दा करते करते

फ़हीम जोगापुरी

यार मेरा मियान-ए-गुलशन है

फ़ाएज़ देहलवी

तुम ऐसा करना कि कोई जुगनू कोई सितारा सँभाल रखना

एज़ाज़ अहमद आज़र

ये शहर ये ख़्वाबों का समुंदर न बचेगा

एज़ाज़ अफ़ज़ल

निगाह-ए-बाग़बाँ कुछ मेहरबाँ मा'लूम होती है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

जाम खनके तो सँभाला न गया दिल तुम से

एज़ाज़ अफ़ज़ल

किस क़दर मसअला-ए-शाम-ओ-सहर बदला है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

डूबने वाले को तिनके का सहारा है बहुत

एलिज़ाबेथ कुरियन मोना

हवा के वास्ते इक काम छोड़ आया हूँ

एजाज़ रहमानी

तब हज़ारों अँधेरों से

एजाज़ रही

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