दर Poetry (page 64)
काले मौसमों की आख़िरी रात
एजाज़ रही
तपती ज़मीं पे पाँव न धर अब भी लौट जा
एजाज़ रही
दिनों महीनों आँखें रोईं नई रुतों की ख़्वाहिश में
एजाज़ गुल
निशान-ए-ज़िंदगी
एजाज़ गुल
यहीं था बैठा हुआ दरमियाँ कहाँ गया मैं
एजाज़ गुल
सूरत-ए-सहर जाऊँ और दर-ब-दर जाऊँ
एजाज़ गुल
क़ाफ़िला उतरा सहरा में और पेश वही मंज़र आए
एजाज़ गुल
मंज़र-ए-वक़्त की यकसानी में बैठा हुआ हूँ
एजाज़ गुल
हम तुम जब भी प्यार करेंगे जान-ओ-दिल सदक़े होंगे
एजाज़ गुल
गलियों में भटकना रह-ए-आलाम में रहना
एजाज़ गुल
दुश्वार है अब रास्ता आसान से आगे
एजाज़ गुल
सरोश
एजाज़ फ़ारूक़ी
कतबा
एजाज़ फ़ारूक़ी
रौशनी को तीरगी का क़हर बन कर ले गया
एजाज़ अासिफ़
हर एक शय की हक़ीक़त से बा-ख़बर देखूँ
एजाज़ अासिफ़
कुछ मिरे शौक़ ने दर-पर्दा कहा हो जैसे
एहतिशाम हुसैन
ग़म में इक मौज सरख़ुशी की है
एहतिशाम हुसैन
डर डर के जिसे मैं सुन रहा हूँ
एहतिशाम हुसैन
सता रही है बहुत मछलियों की बास मुझे
एहतिशाम अख्तर
तौक़ीर अँधेरों की बढ़ा दी गई शायद
एहतराम इस्लाम
रहे जो ज़िंदगी में ज़िंदगी का आसरा हो कर
एहसान दानिश
कभी कभी जो वो ग़ुर्बत-कदे में आए हैं
एहसान दानिश
जीने के लिए जो मर रहे हैं
एहसान दानिश
अपनी रुस्वाई का एहसास तो अब कुछ भी नहीं
एहसान दानिश
पत्थर न बना दे मुझे मौसम की ये सख़्ती
डॉ. पिन्हाँ
मंज़र है अभी दूर ज़रा हद्द-ए-नज़र से
डॉ. पिन्हाँ
अश्क पर ज़ोर कुछ चला ही नहीं
डॉक्टर आज़म
अक़्ल कितनी शुऊ'र कितना है
डॉक्टर आज़म
कभी आँसू कभी ख़्वाबों के धारे टूट जाते हैं
दिनेश ठाकुर
आइने से कब तलक तुम अपना दिल बहलाओगे
दिनेश ठाकुर
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