दर Poetry (page 76)

पहला जश्न-ए-आज़ादी

असरार-उल-हक़ मजाज़

मादाम

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़्वाब-ए-सहर

असरार-उल-हक़ मजाज़

इंक़लाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

फ़िक्र

असरार-उल-हक़ मजाज़

एक ग़मगीन याद

असरार-उल-हक़ मजाज़

दिल्ली से वापसी

असरार-उल-हक़ मजाज़

आवारा

असरार-उल-हक़ मजाज़

आज की रात

असरार-उल-हक़ मजाज़

साज़गार है हमदम इन दिनों जहाँ अपना

असरार-उल-हक़ मजाज़

दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी

असरार-उल-हक़ मजाज़

अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था

असरार-उल-हक़ मजाज़

कैसे रफ़ू हों चाक-ए-गरेबाँ मैं भी सोचूँ तू भी सोच

असरारुल हक़ असरार

फिर कोई ताज़ा-सितम वो सितम-ईजाद करे

असरा रिज़वी

जब उस की तस्वीर बनाई जाती है

असलम राशिद

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

असलम महमूद

बे-रंग न वापस कर इक संग ही दे सर को

असलम महमूद

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

असलम महमूद

क्यूँ मुझ से गुरेज़ाँ है मैं तेरा मुक़द्दर हूँ

असलम महमूद

बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ

असलम महमूद

ऐ मिरे ग़ुबार-ए-सर तू ही तो नहीं तन्हा राएगाँ तो मैं भी हूँ

असलम महमूद

ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर

असलम कोलसरी

रफ़ीक़ दोस्त मुहिब मुझ को शाक़ सब ही थे

असलम हनीफ़

ख़ौफ़

असलम इमादी

न दश्त ओ दर से अलग था न जंगलों से जुदा

असलम आज़ाद

ज़हर

असलम आज़ाद

यादों का लम्स ज़ेहन को छू कर गुज़र गया

असलम आज़ाद

बस एक बार उसे रौशनी में देखा था

असलम आज़ाद

मय-शिकस्ता-दिली ऐ हरीफ़-ए-ज़ौक़-ए-नुमू

असलम अंसारी

ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल

असलम अंसारी

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