दर Poetry (page 81)

रंगीं बना के दामन-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर को मैं

अनवर सहारनपुरी

मैं ख़ुश हूँ अगर गुलशन के लिए कुछ मेरा लहू काम आ जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

इस वास्ते दामन चाक किया शायद ये जुनूँ काम आ जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

ख़्वाब बिखरेंगे तो हम को भी बिखरना होगा

अनवर मीनाई

जब ज़मीं के मुक़द्दर सँवर जाएँगे

अनवर मीनाई

आज मुझे कुछ लोग मिले हैं पागल से

अनवर मीनाई

पढ़ने भी न पाए थे कि वो मिट भी गई थी

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

रात का क्या ज़िक्र है शाम-ओ-सहर आया नहीं

अनवर जमाल अनवर

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

थक के बैठे हो दर-ए-सौम'अ पर क्या 'अनवर'

अनवर देहलवी

यूसुफ़-ए-हुस्न का हुस्न आप ख़रीदार रहा

अनवर देहलवी

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

कोई सदा न दूर तलक नक़्श-ए-पा कोई

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे

अनवर अंजुम

कोई भी सजनी किसी भी साजन की मुंतज़िर है न मुज़्तरिब है

अनवर अलीमी

नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है

अनवर अलीमी

आज कुछ यूँ शब-ए-तन्हाई का अफ़्साना चले

अनवर मोअज़्ज़म

इतना सन्नाटा है कुछ बोलते डर लगता है

अनवर महमूद खालिद

शहर-दर-शहर फ़ज़ाओं में धुआँ है अब के

अनवर महमूद खालिद

ख़ुदा भी मेरी तरह बा-कमाल ऐसा था

अनवर महमूद खालिद

हर घर के मकीनों ने ही दर खोले हुए थे

अंजुम तराज़ी

बरहम हैं मुझ पे इस लिए दोनों तरफ़ के लोग

अंजुम सलीमी

सोला दिसम्बर

अंजुम सलीमी

उसे छूते हुए भी डर रहा था

अंजुम सलीमी

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