दर Poetry (page 80)

ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे

अर्श सिद्दीक़ी

हंगामा-हा-ए-बादा-ओ-पैमाना देख कर

अर्श सहबाई

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

ये दौर-ए-ख़िरद है दौर-ए-जुनूँ इस दौर में जीना मुश्किल है

अर्श मलसियानी

रहगुज़र रहगुज़र से पूछ लिया

अर्श मलसियानी

जिस में हो दोज़ख़ का डर क्या लुत्फ़ उस जीने में है

अर्श मलसियानी

दिमाग़-ओ-दिल पे हो क्या असर अँधेरे का

अरमान नज्मी

अपनी सच्चाई का आज़ार जो पाले हुए हैं

अरमान नज्मी

जो राह चलना है ख़ुद ही चुन लो यहाँ कोई राहबर नहीं है

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

तलाश

आरिफ़ा शहज़ाद

ज़िंदगी यूँ करें बसर कब तक

आरिफ़ इशतियाक़

ज़मीं से ता-ब-फ़लक कोई फ़ासला भी नहीं

आरिफ़ अब्दुल मतीन

तितलियाँ रंगों का महशर हैं कभी सोचा न था

आरिफ़ अब्दुल मतीन

रूह के जलते ख़राबे का मुदावा भी नहीं

आरिफ़ अब्दुल मतीन

हम भी नादाँ हैं समझते हैं कि छट जाएगी

आरिफ़ अब्दुल मतीन

बजा कि कश्ती है पारा पारा थपेड़े तूफ़ाँ के खा रहा हूँ

आरिफ़ अब्दुल मतीन

हवस का रंग चढ़ा उस पे और उतर भी गया

अक़ील शादाब

ज़ीस्त करना दर-ए-इदराक से बाहर है अभी

अक़ील अब्बास जाफ़री

मज़ा देता है याद आ कर तिरा बिस्मिल बना देना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

कहाँ मुमकिन है पोशीदा ग़म-ए-दिल का असर होना

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

आना भी आने वाले का अफ़्साना हो गया

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

मैं अपने-आप से पीछा छुड़ा के

अनवर शऊर

कुछ दिनों अपने घर रहा हूँ मैं

अनवर शऊर

कुछ दिन तो कर तआ'वुन ऐ ख़ुश-सिफ़ात मुझ से

अनवर शऊर

जो सुनता हूँ कहूँगा मैं जो कहता हूँ सुनूँगा मैं

अनवर शऊर

और न दर-ब-दर फिरा और न आज़मा मुझे

अनवर शऊर

अकेले क्या पस-ए-दीवार-ओ-दर गए हम तुम

अनवर शऊर

ऐसे देखा है कि देखा ही न हो

अनवर शऊर

पागलों की मद्ह में

अनवर सेन रॉय

ख़्वाबों को समझौते रास नहीं आते

अनवर सेन रॉय

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