दीद Poetry (page 10)

सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए

बासित भोपाली

यकसाँ लगें हैं उन को तो दैर-ओ-हरम बहम

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

चोर-बाज़ार

अज़ीज़ क़ैसी

क्यूँ न हो शौक़ तिरे दर पे जबीं-साई का

अज़ीज़ लखनवी

देख कर हर दर-ओ-दीवार को हैराँ होना

अज़ीज़ लखनवी

थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हर एक राह में इम्कान-ए-हादिसा है अभी

अज़हर नैयर

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

सीने में उन के जल्वे छुपाए हुए तो हैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

सदियों से अजनबी

अासिफ़ शफ़ी

अहद-ए-वफ़ा न याद दिलाएँ तो क्या करें

अशरफ़ रफ़ी

मैं कामयाब-ए-दीद भी महरूम-ए-दीद भी

असग़र गोंडवी

शिकवा न चाहिए कि तक़ाज़ा न चाहिए

असग़र गोंडवी

मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में

असग़र गोंडवी

गुम कर दिया है दीद ने यूँ सर-ब-सर मुझे

असग़र गोंडवी

अक्स किस चीज़ का आईना-ए-हैरत में नहीं

असग़र गोंडवी

आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया

असग़र गोंडवी

मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ

आरज़ू लखनवी

हाँ दीद का इक़रार अगर हो तो अभी हो

आरज़ू लखनवी

यार के नर्गिस-ए-बीमार का बीमार रहा

अरशद अली ख़ान क़लक़

वाइज़ की ज़िद से रिंदों ने रस्म-ए-जदीद की

अरशद अली ख़ान क़लक़

वा'दा-ख़िलाफ़ कितने हैं ऐ रश्क-ए-माह आप

अरशद अली ख़ान क़लक़

सोते हैं फैल फैल के सारे पलंग पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

रोज़-ए-अव्वल से असीर ऐ दिल-ए-नाशाद हैं हम

अरशद अली ख़ान क़लक़

हम तो हों दिल से दूर रहें पास और लोग

अरशद अली ख़ान क़लक़

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