दिल Poetry (page 291)

सोए कहाँ थे आँखों ने तकिए भिगोए थे

बशीर बद्र

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं

बशीर बद्र

सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में

बशीर बद्र

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बशीर बद्र

रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना

बशीर बद्र

प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी

बशीर बद्र

पिछली रात की नर्म चाँदनी शबनम की ख़ुनकी से रचा है

बशीर बद्र

फूल बरसे कहीं शबनम कहीं गौहर बरसे

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

पहला सा वो ज़ोर नहीं है मेरे दुख की सदाओं में

बशीर बद्र

मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

बशीर बद्र

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बँधा हुआ

बशीर बद्र

ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है

बशीर बद्र

होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते

बशीर बद्र

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए

बशीर बद्र

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है

बशीर बद्र

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे

बशीर बद्र

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

बशीर बद्र

अब तो अँगारों के लब चूम के सो जाएँगे

बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

बशीर बद्र

मुब्तला-ए-इ'ताब हैं हम लोग

बशीरुद्दीन राज़

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

हुई मुद्दतें ऐ दिल-ए-हज़ीं न पयाम है न सलाम है

बशीरुद्दीन राज़

हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले

बशीर मुंज़िर

हर रोज़ ही दिन भर के झमेलों से निमट के

बशीर मुंज़िर

हैराँ है ज़माने में किसे अपना कहे दिल

बशीर मुंज़िर

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