दिल Poetry (page 289)

उन का बर्बाद-ए-करम कहने के क़ाबिल हो गया

बासित भोपाली

सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए

बासित भोपाली

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

कुछ सिला ही न मिला इश्क़ में जल जाने का

बासित भोपाली

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

किसी के नक़्श-ए-क़दम का निशाँ नहीं मिलता

बासित भोपाली

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

हर तरफ़ सोज़ का अंदाज़ जुदागाना है

बासित भोपाली

दिल लगा लेते हैं अहल-ए-दिल वतन कोई भी हो

बासिर सुल्तान काज़मी

अब दिल को समझाए कौन

बासिर सुल्तान काज़मी

था जो कभी इक शौक़-ए-फ़ुज़ूल

बासिर सुल्तान काज़मी

जिन दिनों ग़म ज़ियादा होता है

बासिर सुल्तान काज़मी

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं

बासिर सुल्तान काज़मी

दिल लगा लेते हैं अहल-ए-दिल वतन कोई भी हो

बासिर सुल्तान काज़मी

बादल है और फूल खिले हैं सभी तरफ़

बासिर सुल्तान काज़मी

ये छेड़ क्या है ये क्या मुझ से दिल-लगी है कोई

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

मिरा दिल भी तिलिस्मी है ख़ज़ाना

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कौन कहता है नसीम-ए-सहरी आती है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ाहिर मिरी शिकस्त के आसार भी नहीं

बशीर सैफ़ी

किसे ख़बर है मैं दिल से कि जाँ से गुज़रूँगा

बशीर सैफ़ी

ऐसा लगता है मुख़ालिफ़ है ख़ुदाई मेरी

बशीर सैफ़ी

सब की मौजूदगी समझता है

बशीर महताब

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