दिल Poetry (page 292)

क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ाई कूचा-गर्द फ़क़ीर हुए

बशीर अहमद बशीर

कैसी कैसी थीं उन्ही गलियों में ज़ेबा सूरतें

बशीर अहमद बशीर

जी नहीं लगता किताबों में किताबें क्या करें

बशीर अहमद बशीर

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं

बशर नवाज़

पता नहीं वो कौन था

बशर नवाज़

मुझे जीना नहीं आता

बशर नवाज़

रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे

बशर नवाज़

रब्त हर बज़्म से टूटे तिरी महफ़िल के सिवा

बशर नवाज़

कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो

बशर नवाज़

हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा

बशर नवाज़

चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो

बशर नवाज़

बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग

बशर नवाज़

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

बशर नवाज़

ब-हर-उनवाँ मोहब्बत को बहार-ए-ज़िंदगी कहिए

बशर नवाज़

आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी

बशर नवाज़

पूछा अगर किसी ने मिरा आ के हाल-ए-दिल

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

नहीं बुतों के तसव्वुर से कोई दिल ख़ाली

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

छुप सका दम भर न राज़-ए-दिल फ़िराक़-ए-यार में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वो शाह-ए-हुस्न जो बे-मिस्ल है हसीनों में

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

क़मर की वो ख़ुर्शीद तस्वीर है

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

पर्दा उलट के उस ने जो चेहरा दिखा दिया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

न रहे नामा ओ पैग़ाम के लाने वाले

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

देखी जो ज़ुल्फ़-ए-यार तबीअत सँभल गई

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

असर ज़ुल्फ़ का बरमला हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही

बर्क़ देहलवी

यही रस्ता है अब यही मंज़िल

बाक़ी सिद्दीक़ी

तुम ज़माने की राह से आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

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