दिल Poetry (page 293)

वो मक़ाम-ए-दिल-ओ-जाँ क्या होगा

बाक़ी सिद्दीक़ी

वक़्त रस्ते में खड़ा है कि नहीं

बाक़ी सिद्दीक़ी

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

तुम कब थे क़रीब इतने मैं कब दूर रहा हूँ

बाक़ी सिद्दीक़ी

तिरी निगाह का अंदाज़ क्या नज़र आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

सुब्ह का भेद मिला क्या हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

रस्म-ए-सज्दा भी उठा दी हम ने

बाक़ी सिद्दीक़ी

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

मरहले ज़ीस्त के आसान हुए

बाक़ी सिद्दीक़ी

मरहला दिल का न तस्ख़ीर हुआ

बाक़ी सिद्दीक़ी

कहता है हर मकीं से मकाँ बोलते रहो

बाक़ी सिद्दीक़ी

जुनूँ की राख से मंज़िल में रंग क्या आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

इस कार-ए-गह-ए-रंग में हम तंग नहीं क्या

बाक़ी सिद्दीक़ी

एतिबार-ए-नज़र करें कैसे

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल जिंस-ए-मोहब्बत का ख़रीदार नहीं है

बाक़ी सिद्दीक़ी

दाग़-ए-दिल हम को याद आने लगे

बाक़ी सिद्दीक़ी

ऐसा वार पड़ा सर का

बाक़ी सिद्दीक़ी

आस्तीं में साँप इक पलता रहा

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ सितमगर नहीं होते जानाँ

बाक़ी अहमदपुरी

तू नहीं तो तेरा दर्द-ए-जाँ-फ़ज़ा मिल जाएगा

बाक़ी अहमदपुरी

तेरी तरह मलाल मुझे भी नहीं रहा

बाक़ी अहमदपुरी

सामने सब के न बोलेंगे हमारा क्या है

बाक़ी अहमदपुरी

मुझ से बिछड़ के वो भी परेशान था बहुत

बाक़ी अहमदपुरी

बहुत जल्दी थी घर जाने की लेकिन

बाक़ी अहमदपुरी

सैलाब से आँखों के रहते हैं ख़राबे में

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

काबा तो संग-ओ-ख़िश्त से ऐ शैख़ मिल बना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

यकसाँ लगें हैं उन को तो दैर-ओ-हरम बहम

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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