दिल Poetry (page 358)

शाम आए और घर के लिए दिल मचल उठे

अख़्तर उस्मान

शश-जिहत

अख़्तर उस्मान

नए सुर की तमसील

अख़्तर उस्मान

तू ने एक उम्र के बाद पूछा है हाल-ए-दिल

अख्तर शुमार

मुद्दतों में आज दिल ने फ़ैसला आख़िर दिया

अख्तर शुमार

या तो सूरज झूट है या फिर ये साया झूट है

अख्तर शुमार

वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता

अख्तर शुमार

तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है

अख्तर शुमार

सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़

अख्तर शुमार

लरज़ उठा है मिरे दिल में क्यूँ न जाने दिया

अख्तर शुमार

ख़्वाहिश-ए-जादा-ए-राहत से निकलता कैसे

अख्तर शुमार

हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए

अख्तर शुमार

ऐ दुनिया तेरे रस्ते से हट जाएँगे

अख्तर शुमार

अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं

अख्तर शुमार

रात भर उन का तसव्वुर दिल को तड़पाता रहा

अख़्तर शीरानी

मुद्दतें हो गईं बिछड़े हुए तुम से लेकिन

अख़्तर शीरानी

काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें

अख़्तर शीरानी

इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम

अख़्तर शीरानी

ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए

अख़्तर शीरानी

आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या

अख़्तर शीरानी

वक़्त की क़द्र

अख़्तर शीरानी

नज़्र-ए-वतन

अख़्तर शीरानी

नन्हा क़ासिद

अख़्तर शीरानी

मुझे ले चल

अख़्तर शीरानी

जहाँ 'रेहाना' रहती थी

अख़्तर शीरानी

एक हुस्न-फ़रोश से

अख़्तर शीरानी

दावत

अख़्तर शीरानी

बस्ती की लड़कियों के नाम

अख़्तर शीरानी

बदनाम हो रहा हूँ

अख़्तर शीरानी

अँगूठी

अख़्तर शीरानी

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