दिल Poetry (page 388)

जब वो नज़रें दो-चार होती हैं

आफ़ताब शाह आलम सानी

घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया

आफ़ताब शाह आलम सानी

देखो तो किस अदा से रुख़ पर हैं डाली ज़ुल्फ़ें

आफ़ताब शाह आलम सानी

फिर से तालीफ़-ए-दिल हो फिर कोई

आफ़ताब इक़बाल शमीम

वो अपने जुज़्व में खोया गया है इस हद तक

आफ़ताब इक़बाल शमीम

वो आसमाँ के दरख़शिंदा राहियोँ जैसा

आफ़ताब इक़बाल शमीम

मैं जब भी छूने लगूँ तुम ज़रा परे हो जाओ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

मैं अपने वास्ते रस्ता नया निकालता हूँ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

कहीं सोता न रह जाऊँ सदा दे कर जगाओ ना

आफ़ताब इक़बाल शमीम

जब वो इक़रार-ए-आश्नाई करे

आफ़ताब इक़बाल शमीम

जब चाहा ख़ुद को शाद या नाशाद कर लिया

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हाँफती नद्दी में दम टूटा हुआ था लहर का

आफ़ताब इक़बाल शमीम

ये दिल की राह चमकती थी आइने की तरह

आफ़ताब हुसैन

किसी तरह तो घटे दिल की बे-क़रारी भी

आफ़ताब हुसैन

फ़िराक़ मौसम की चिलमनों से विसाल लम्हे चमक उठेंगे

आफ़ताब हुसैन

चलो कहीं पे तअल्लुक़ की कोई शक्ल तो हो

आफ़ताब हुसैन

ज़रा सी देर को चमका था वो सितारा कहीं

आफ़ताब हुसैन

ये जब्र भी है बहुत इख़्तियार करते हुए

आफ़ताब हुसैन

तुम्हारे बाद रहा क्या है देखने के लिए

आफ़ताब हुसैन

शब-ए-सियाह पे वा रौशनी का बाब तो हो

आफ़ताब हुसैन

क़दम क़दम पे किसी इम्तिहाँ की ज़द में है

आफ़ताब हुसैन

निगाह के लिए इक ख़्वाब भी ग़नीमत है

आफ़ताब हुसैन

मुनाफ़िक़त का निसाब पढ़ कर मोहब्बतों की किताब लिखना

आफ़ताब हुसैन

मक़ाम-ए-शौक़ से आगे भी इक रस्ता निकलता है

आफ़ताब हुसैन

मैं सोचता हूँ अगर इस तरफ़ वो आ जाता

आफ़ताब हुसैन

किसी नज़र ने मुझे जाम पर लगाया हुआ है

आफ़ताब हुसैन

करता कुछ और है वो दिखाता कुछ और है

आफ़ताब हुसैन

घड़ी घड़ी उसे रोको घड़ी घड़ी समझाओ

आफ़ताब हुसैन

फ़सील-ए-शहर-ए-तमन्ना में दर बनाते हुए

आफ़ताब हुसैन

दिल भी आप को भूल चुका है

आफ़ताब हुसैन

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