दिल Poetry (page 389)

अस्ल हालत का बयाँ ज़ाहिर के साँचों में नहीं

आफ़ताब हुसैन

अना को बाँधता रहता हूँ अपने शे'रों में

आफ़ताब हुसैन

कहूँ जो कर्ब फ़क़त कर्ब-ए-ज़ात समझोगे

आफ़ताब आरिफ़

वतन का राग

अफ़सर मेरठी

यास है हसरत है ग़म है और शब-ए-दीजूर है

अफ़सर मेरठी

वो हमारी सम्त अपना रुख़ बदलता क्यूँ नहीं

अफ़सर माहपुरी

उन से हर हाल में तुम सिलसिला-जुम्बाँ रखना

अफ़सर माहपुरी

क्या बताएँ हाल-ए-दिल उन की शनासाई के ब'अद

अफ़सर माहपुरी

अजीब चीज़ मोहब्बत की वारदात भी है

अफ़सर माहपुरी

तुम्हारे हिज्र में क्यूँ ज़िंदगी न मुश्किल हो

अफ़सर इलाहाबादी

मुझे गुम-शुदा दिल का ग़म है तो ये है

अफ़सर इलाहाबादी

वही जो हया थी निगार आते आते

अफ़सर इलाहाबादी

तुम्हारे हिज्र में क्यूँ ज़िंदगी न मुश्किल हो

अफ़सर इलाहाबादी

न हो या रब ऐसी तबीअत किसी की

अफ़सर इलाहाबादी

कुछ भी नहीं जो याद-ए-बुतान-ए-हसीं नहीं

अफ़सर इलाहाबादी

तिश्नगी बाक़ी रहे दीवानगी बाक़ी रहे

अफ़रोज़ तालिब

शुऊ'र-ए-दिल से

अफ़रोज़ आलम

बे-क़रारी

अफ़रोज़ आलम

यूँ ख़बर किसे थी मेरी तिरी मुख़बिरी से पहले

अफ़रोज़ आलम

जिगर को ख़ून किए दिल को बे-क़रार अभी

अफ़रोज़ आलम

गुज़रे लम्हात का एहसास हुआ जाता है

अफ़रोज़ आलम

ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है

अफ़रोज़ आलम

उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की

अफ़ीफ़ सिराज

शौक़-ए-वारफ़्ता चला शहर-ए-तमाशा की तरफ़

अफ़ीफ़ सिराज

शब ढली मेरी और सहर न हुई

अफ़ीफ़ सिराज

हम अहल-ए-नज़ारा शाम-ओ-सहर आँखों को फ़िदया करते हैं

अफ़ीफ़ सिराज

हरीम-ए-दिल से निकल आँख के सराब में आ

अफ़ीफ़ सिराज

हमारी तिश्ना-लबी अब सुबू से खेलेगी

अफ़ीफ़ सिराज

बरसों के जैसे लम्हों में ये रात गुज़रती जाएगी

अफ़ीफ़ सिराज

अंदाज़-ए-नुमू कैसा अलमनाक निकाला

अफ़ीफ़ सिराज

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