दिल Poetry (page 96)

क्या चीज़ है ये सई-ए-पैहम क्या जज़्बा-ए-कामिल होता है

शकेब जलाली

कोई इस दिल का हाल क्या जाने

शकेब जलाली

कहाँ रुकेंगे मुसाफ़िर नए ज़मानों के

शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है

शकेब जलाली

इस ख़ाक-दाँ में अब तक बाक़ी हैं कुछ शरर से

शकेब जलाली

इस बुत-कदे में तू जो हसीं-तर लगा मुझे

शकेब जलाली

हवा-ए-शब से न बुझते हैं और न जलते हैं

शकेब जलाली

ग़म-ए-उल्फ़त मिरे चेहरे से अयाँ क्यूँ न हुआ

शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं

शकेब जलाली

गले मिला न कभी चाँद बख़्त ऐसा था

शकेब जलाली

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है

शकेब जलाली

बस इक शुआ-ए-नूर से साया सिमट गया

शकेब जलाली

अब आप रह-ए-दिल जो कुशादा नहीं रखते

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे

शकेब जलाली

तू न आया तिरी यादों की हवा तो आई

शकेब बनारसी

न दिन पहाड़ लगे अब न रात भारी लगे

शकेब बनारसी

दामन-ए-ज़ब्त को अश्कों में भिगो लेता हूँ

शकेब बनारसी

सुन ली रामायन की जब पूरी कथा

शाइस्ता यूसुफ़

मैं रिवायत हूँ एक भूली हुई

शाइस्ता यूसुफ़

ये सितारे मुझे दीवार नहीं होने के

शाइस्ता सहर

जुनून-ए-इश्क़ की आमादगी ने कुछ न दिया

शाइस्ता सहर

बाग़ में कलियों का मुस्काना गया

शाइस्ता सहर

शब-ए-तन्हाई

शाइस्ता मुफ़्ती

शाम आ कर झरोकों में बैठी रहे

शाइस्ता मुफ़्ती

लिखे हुए अल्फ़ाज़ में तासीर नहीं है

शाइस्ता मुफ़्ती

ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गया

शाइस्ता मुफ़्ती

अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसे

शाइस्ता मुफ़्ती

आइना देखा तो सूरत अपनी पहचानी गई

शाइस्ता मुफ़्ती

दाएरे

शाइस्ता हबीब

न दिन ही चैन से गुज़रा न कोई रात मिरी

शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

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