दिन Poetry (page 104)

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

जुज़ तिरे कोई भी दिन रात न जाने मेरे

अहमद फ़राज़

जब यार ने रख़्त-ए-सफ़र बाँधा कब ज़ब्त का पारा उस दिन था

अहमद फ़राज़

ग़ैरत-ए-इश्क़ सलामत थी अना ज़िंदा थी

अहमद फ़राज़

यहाँ लिखना मनअ है

अहमद आज़ाद

जो मेरे मरने का तमाशा नहीं देखना चाहती

अहमद आज़ाद

चूहा

अहमद आज़ाद

वो ज़माना है कि अब कुछ नहीं दीवाने में

अहमद अता

सफ़्हा-ए-ज़ीस्त जब पढूँगा तुम्हें

अहमद अता

मैं तिरी मानता लेकिन जो मिरा दिल है ना

अहमद अता

दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है

अहमद अता

क्या ख़बर थी राज़-ए-दिल अपना अयाँ हो जाएगा

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

क्या कर रहे हो ज़ुल्म करो राह राह का

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

सन्नाटे का आलम क़ब्र में है है ख़्वाब-ए-अदम आराम नहीं

आग़ा हज्जू शरफ़

पाया तिरे कुश्तों ने जो मैदान-ए-बयाबाँ

आग़ा हज्जू शरफ़

किस के हाथों बिक गया किस के ख़रीदारों में हूँ

आग़ा हज्जू शरफ़

जश्न था ऐश-ओ-तरब की इंतिहा थी मैं न था

आग़ा हज्जू शरफ़

हुआ है तौर-ए-बर्बादी जो बे-दस्तूर पहलू में

आग़ा हज्जू शरफ़

दिल को लटका लिया है गेसू में

आग़ा हज्जू शरफ़

आग लगा दी पहले गुलों ने बाग़ में वो शादाबी की

आग़ा हज्जू शरफ़

ख़ुश-क़िस्मत हैं वो जो गाँव में लम्बी तान के सोते हैं

अफ़ज़ल परवेज़

ऐसे कुछ दिन भी थे जो हम से गुज़ारे न गए

अफ़ज़ाल नवेद

न रोना रह गया बाक़ी न हँसना रह गया बाक़ी

अफ़ज़ाल नवेद

हम ने कुछ पँख जो दालान में रख छोड़े हैं

अफ़ज़ाल नवेद

एक उजली उमंग उड़ाई थी

अफ़ज़ाल नवेद

इक धन को एक धन से अलग कर लूँ और गाऊँ

अफ़ज़ाल नवेद

हमारे ख़ून के प्यासे पशेमानी से मर जाएँ

अफ़ज़ल ख़ान

ये कैसे ख़्वाब की ख़्वाहिश में घर से निकला हूँ

अफ़ज़ल गौहर राव

क्या मुसीबत है कि हर दिन की मशक़्क़त के एवज़

अफ़ज़ल गौहर राव

नींद आई न खुला रात का बिस्तर मुझ से

अफ़ज़ल गौहर राव

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