दिन Poetry (page 14)

भेज कर शहर हारती है मुझे

तालिब हुसैन तालिब

मिरे ख़याल का साया जहाँ पड़ा होगा

तख़्त सिंह

ख़ुशी ज़रूर थी 'तैमूर' दिन निकलने की

तैमूर हसन

वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई

तैमूर हसन

मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूँ

तहज़ीब हाफ़ी

ये एक बात समझने में रात हो गई है

तहज़ीब हाफ़ी

न नींद और न ख़्वाबों से आँख भरनी है

तहज़ीब हाफ़ी

जब उस की तस्वीर बनाया करता था

तहज़ीब हाफ़ी

बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता

तहज़ीब हाफ़ी

मिरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो

ताहिर फ़राज़

कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा

ताहिर फ़राज़

जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी

ताहिर फ़राज़

अजीब हम हैं सबब के बग़ैर चाहते हैं

ताहिर फ़राज़

जो तिरे इंतिज़ार में गुज़रे

ताहिर अज़ीम

जो बहुत बे-क़रार रखते थे

ताहिर अज़ीम

हर्फ़

ताहिर अज़ीम

मौसम-ए-गुल बहार के दिन थे

ताहिर अज़ीम

मैं उस की मोहब्बत से इक दिन भी मुकर जाता

ताहिर अज़ीम

हर अदा तुंद और नबात उस की

ताबिश सिद्दीक़ी

देव-मालाएँ सच्ची होती हैं

ताबिश कमाल

शर्मिंदा हम जुनूँ से हैं एक एक तार के

ताबिश देहलवी

मंज़िलों को नज़र में रक्खा है

ताबिश देहलवी

ये चार दिन की रिफ़ाक़त भी कम नहीं ऐ दोस्त

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

उधर चमन में ज़र-ए-गुल लुटा इधर 'ताबाँ'

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

क़ुसूर इश्क़ में ज़ाहिर है सब हमारा था

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

नुमू के फ़ैज़ से रंग-ए-चमन निखर सा गया

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

एक तुम ही नहीं दुनिया में जफ़ाकार बहुत

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

बहार आई गुल-अफ़्शानियों के दिन आए

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

शब को फिरे वो रश्क-ए-माह ख़ाना-ब-ख़ाना कू-ब-कू

ताबाँ अब्दुल हई

क़फ़स से छूटने की कब हवस है

ताबाँ अब्दुल हई

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