दिन Poetry (page 39)

किरदार कह रहे हैं कुछ अपनी ज़बान में

सग़ीर मलाल

जिस को तय कर न सके आदमी सहरा है वही

सग़ीर मलाल

उस की यादें महकती रहती हैं

सग़ीर अालम

कैसे कैसे मंज़र मेरी आँखों में आ जाते हैं

सग़ीर अालम

तुम गए रौनक़-ए-बहार गई

साग़र सिद्दीक़ी

मुस्कुराओ बहार के दिन हैं

साग़र सिद्दीक़ी

रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए कुछ याद रही कुछ भूल गए

साग़र सिद्दीक़ी

मुस्कुराओ बहार के दिन हैं

साग़र सिद्दीक़ी

ख़ता-वार-ए-मुरव्वत हो न मरहून-ए-करम हो जा

साग़र सिद्दीक़ी

सावन की रुत आ पहुँची काले बादल छाएँगे

साग़र निज़ामी

रातों को तसव्वुर है उन का और चुपके चुपके रोना है

साग़र निज़ामी

नग़्मे हवा ने छेड़े फ़ितरत की बाँसुरी में

साग़र निज़ामी

वो भी क्या दिन थे कि जब इश्क़ लड़ा लेते थे

साग़र ख़य्यामी

ज़रूरत-ए-रिश्ता

साग़र ख़य्यामी

पस-ए-रौशनी

साग़र ख़य्यामी

इक्कीसवीं सदी का आदमी

साग़र ख़य्यामी

गिर्या-ए-शैताँ

साग़र ख़य्यामी

दिल्ली की बस

साग़र ख़य्यामी

अलाउद्दीन का तरबूज़

साग़र ख़य्यामी

बैठे हैं ऐसे ज़ुल्फ़ में कलियाँ सँवार के

साग़र ख़य्यामी

वो आज भी क़रीब से कुछ कह के हट गए

साग़र आज़मी

गुलशन को बहारों ने इस तरह नवाज़ा है

साग़र आज़मी

ऐसी नहीं है बात कि क़द अपने घट गए

साग़र आज़मी

उर्दू-ए-मुअ'ल्ला

सफ़ी लखनवी

दीदा-ओ-दिल मिरी सरकार उठा लाए हैं

सफ़दर सलीम सियाल

अपने अहद-ए-वफ़ा से रु-गर्दानी करता रहता है

सफ़दर सलीम सियाल

रेत

सईदुद्दीन

नज़्म

सईदुद्दीन

नज़्म

सईदुद्दीन

नज़्म

सईदुद्दीन

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