दिन Poetry (page 40)

नया फ़्रेम

सईदुद्दीन

रोज़ हवा में उड़ने की फ़रमाइश है

सईद क़ैस

ग़म रात-दिन रहे तो ख़ुशी भी कभी रही

सईद अख़्तर

उस दिन से पानियों की तरह बह रहे हैं हम

सईद अहमद

और दिया जलता है ख़्वाब में

सईद अहमद

पत्थर को पूजते थे कि पत्थर पिघल पड़ा

सईद अहमद

खुलता है यूँ हवा का दरीचा समझ लिया

सईद अहमद

अदू से शिकवा-ए-क़ैद-ओ-क़फ़स क्या

सईद आसिम

रात दिन तू रहे रक़ीबाँ-संग

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

मेरी जाँ वो बादा-ख़्वारी याद है

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

चौधवाँ उस चंदर का साल हुआ

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

किस मुँह से ज़िंदगी को वो रख़्शंदा कह सकें

सादिक़ नसीम

ये क्या हुआ कि हर इक रस्म-ओ-राह तोड़ गए

सादिक़ इंदौरी

गुज़रे हैं तेरे साथ जो दिन-रात अभी तक

सादिक़ा फ़ातिमी

फ़र्जाम

सादिक़

अल्फ़ाज़ की विलादत

सादिक़

बिस्तर बिछा के रात वो कमरे में सो गया

सादिक़

लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना

सदफ़ जाफ़री

ख़ुशबू से हो सका न वो मानूस आज तक

सदफ़ जाफ़री

दिखाएगी असर दिल की पुकार आहिस्ता आहिस्ता

सदा अम्बालवी

कैसे सच से रहे बे-ख़बर आइना

सचिन शालिनी

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

साबिर ज़फ़र

तन्हाई तामीर करेगी घर से बेहतर इक ज़िंदान

साबिर ज़फ़र

रात को ख़्वाब हो गई दिन को ख़याल हो गई

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

साबिर ज़फ़र

काम इतनी ही फ़क़त राहगुज़र आएगी

साबिर ज़फ़र

उस जंगल से जब गुज़रोगे तो एक शिवाला आएगा

साबिर वसीम

तमाम मोजज़े सारी शहादतें ले कर

साबिर वसीम

राह में शहर-ए-तरब याद आया

साबिर वसीम

गुल ओ महताब लिखना चाहता हूँ

साबिर वसीम

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