दिन Poetry (page 41)

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

तन्हाई

साबिर दत्त

फ़नकार

साबिर दत्त

आज की रात

साबिर दत्त

मौसमों का जवाब दे दीजे

साबिर दत्त

कैसी मअनी की क़बा रिश्तों को पहनाई गई

साबिर अदीब

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

आहिस्ता बोलिएगा तमाशा खड़ा न हो

साबिर

दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

मैं दरिया हूँ मगर दोनों तरफ़ साहिल है तन्हाई

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

जहाँ में जिस की शोहरत कू-ब-कू है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं

सबा अकबराबादी

कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो

सबा अकबराबादी

जुनूँ में गुम हुए होश्यार हो कर

सबा अकबराबादी

अजल होती रहेगी इश्क़ कर के मुल्तवी कब तक

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

मोहब्बत में जीना नई बात है

साइल देहलवी

हक़-ओ-नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना

साइल देहलवी

ये रात दिन का बदलना नज़र में रहता है

सादुल्लाह शाह

नए फ़ित्नों के हर जानिब से इतने सर निकल आए

सअादत बाँदवी

दिल में हो गर ख़्वाहिश-ए-तस्वीर-ए-इबरत देखना

सअादत बाँदवी

बीवी के हुज़ूर

रूही कंजाही

याद आते हो किस सलीक़े से

रूही कंजाही

मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा

रूही कंजाही

हज़ार रंग जलाल-ओ-जमाल के देखे

रूही कंजाही

अपनी मर्ज़ी ही करोगे तुम भी

रूही कंजाही

वीरान ख़्वाहिश

रियाज़ लतीफ़

ये सुन के आज हश्र में वो बात भी तो हो

रियाज़ ख़ैराबादी

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