दिन Poetry (page 45)
साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था
रशीद शाहजहाँपुरी
साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था
रशीद शाहजहाँपुरी
कोई रस्ता कोई रहरव कोई अपना नहीं मिलता
राशिद क़य्यूम अनसर
किसी की जीत का सदमा किसी की मात का बोझ
राशिद मुफ़्ती
हवा के लम्स से भड़का भी हूँ मैं
राशिद मुफ़्ती
हाथ से छू कर ये नीला आसमाँ भी देखते
राशिद मुफ़्ती
सफ़र से किस को मफ़र है लेकिन ये क्या कि बस रेग-ज़ार आएँ
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
भले दिन आएँ तो आने वाले बुरे दिनों का ख़याल रखना
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
कोई साया न शजर याद आया
राशिद हामिदी
आँख खुली तो मुझ को ये इदराक हुआ
राशिद हामिदी
तड़प उठता हूँ यादों से लिपट कर शाम होते ही
राशिद अनवर राशिद
सुना कि ख़ूब है उस के दयार का मौसम
राशिद अनवर राशिद
रेत क़ाबिज़ थी बहुत ख़ामोश लगती थी नदी
राशिद अनवर राशिद
उफ़ुक़ के उस पार
राशिद आज़र
शायद
राशिद आज़र
सफ़र
राशिद आज़र
रात के साए
राशिद आज़र
मुंतज़िर आँखों में जमता ख़ूँ का दरिया देखते
राशिद आज़र
रुके हुए हैं जो दरिया उन्हें रवानी दे
रशीदुज़्ज़फ़र
तुझ से वहशत में भी ग़ाफ़िल कब तिरा दीवाना था
रशीद रामपुरी
तर्क-ए-सितम पे वो जो क़सम खा के रह गए
रशीद रामपुरी
मिरे घर के लोग जो घर मुझी को सुपुर्द कर के चले गए
रशीद रामपुरी
जब नज़र उस ने मिलाई होगी
रशीद रामपुरी
हैं बे-नियाज़-ए-ख़ल्क़ तिरा दर है और हम
रशीद रामपुरी
है निहायत सख़्त शान-ए-इम्तिहान-ए-कू-ए-दोस्त
रशीद रामपुरी
दिल इश्क़ में उन के हारते हैं
रशीद रामपुरी
ये ज़ाविया सूरज का बदल जाएगा साईं
रशीद क़ैसरानी
मैं ने काग़ज़ पे सजाए हैं जो ताबूत न खोल
रशीद क़ैसरानी
कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं
रशीद क़ैसरानी
कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं
रशीद क़ैसरानी
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