दिन Poetry (page 47)

जब उन के पा-ए-नाज़ की ठोकर में आएगा

रम्ज़ आफ़ाक़ी

ज़रा ज़रा सी बात पर वो मुझ से बद-गुमाँ रहे

रमेश कँवल

अब कहाँ वो पहली सी फ़ुर्सतें मयस्सर हैं

राम रियाज़

सरमा था मगर फिर भी वो दिन कितने बड़े थे

राम रियाज़

मुस्कुराती आँखों को दोस्तों की नम करना

राम रियाज़

मुझे कैफ़-ए-हिज्र अज़ीज़ है तू ज़र-ए-विसाल समेट ले

राम रियाज़

लहकती लहरों में जाँ है किनारे ज़िंदा हैं

राम रियाज़

कहीं जंगल कहीं दरबार से जा मिलता है

राम रियाज़

अब के इस तरह तिरे शहर में खोए जाएँ

राम रियाज़

हम तो दिन-रात इसी सोच में मर जाएँगे

राम नाथ असीर

ये टूटी कश्तियाँ और बहर-ए-ग़म के तेज़ धारे हैं

राम कृष्ण मुज़्तर

दिल-ओ-नज़र में न पैदा हुई शकेबाई

राम कृष्ण मुज़्तर

बहारें और वो रंगीं नज़ारे याद आते हैं

राम कृष्ण मुज़्तर

दिल की धड़कन उलझ रही है ये कैसी सौग़ात ग़ज़ल की

रख़शां हाशमी

आख़िरी बस

राजेन्द्र मनचंदा बानी

शफ़क़ शजर मौसमों के ज़ेवर नए नए से

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सद-सौग़ात सकूँ फ़िरदौस सितंबर आ

राजेन्द्र मनचंदा बानी

क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मोड़ था कैसा तुझे था खोने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

किसे मालूम था इक दिन मोहब्बत बे-ज़बाँ होगी

राजेन्द्र कृष्ण

किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता

राजेश रेड्डी

न जिस्म साथ हमारे न जाँ हमारी तरफ़

राजेश रेड्डी

कुछ परिंदों को तो बस दो चार दाने चाहिएँ

राजेश रेड्डी

किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता

राजेश रेड्डी

जिस को भी देखो तिरे दर का पता पूछता है

राजेश रेड्डी

दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ

राजेश रेड्डी

ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू

राजेश रेड्डी

एक दिन भीगे थे बरसात में हम तुम दोनों

राजेन्द्र नाथ रहबर

तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त

राजेन्द्र नाथ रहबर

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